नई दिल्ली: करीब 36 घंटे गुजर गए हैं लेकिन सियाचिन के बर्फीले तूफान में लापता हुए भारतीय सेना के दस जवानों का कोई सुराग नहीं लग पाया है। ये जवान कल सुबह हिमस्खलन यानी एवलॉन्च की चपेट में आ गए थे। सेना और वायुसेना का रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है लेकिन उन दस जांबाजों का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। वहीं, पाकिस्तान की मदद की पेशकश को भारत ने ठुकराया है।
दुनिया की सबसे ऊंची युद्ध भूमि सियाचिन में बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच ज़मीन से 19 हजार 600 फीट की ऊंचाई पर माइनस साठ डिग्री तक के तापमान पर जहां आदमी का खून तक जम जाता है। ऐसी ही बर्फीली पहाड़ियों में आए तूफान में कहीं दस ज़िंदगियां गुम हो गई हैं।
कहां गए माइनस 60 डिग्री वाली सरहद के योद्धा?
लद्दाख के नॉर्थन ग्लैशियर सेक्टर में बुधवार सुबह सेना के कैंप के पास भयानक एवलांच आया था लेकिन करीब 36 घंटे गुजर जाने के बाद भी तूफान में फंसे उन जवानों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।
सभी जवान मद्रास रेजीमेंट के थे। इनमें सेना का एक जेओसी यानी जूनियर कमांड ऑफिसर और 9 जवान शामिल है। ये लोग कैंप की सदर्न साइट की तरफ पैट्रोलिंग पर निकले थे। उन्हें ढूंढने के लिए सेना और वायुसेना दोनों ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया हुआ है लेकिन अब तक कोई पता नहीं चल पाया है कि ये जवान कहां दब गए।
जानकार मानते हैं कि सियाचिन में रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना बहुत मुश्किलों भरा है इसीलिए लापता सैनिकों का अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है।
दुनिया की सबसे ऊंची युद्धभूमि की दर्दनाक हकीकत
आखिर सियाचिन का मोर्चा इतना मुश्किल क्यों है कि वहां बर्फीले तूफान में फंसे जवानों को 36 घंटे बाद भी नहीं ढूंढा जा सका है? ये उतना ही मुश्किल सवाल है जितना सियाचिन में तैनात जवानों की ज़िंदगी, बर्फ से चमकती ये चोटियां भले ही जन्नत सा आभास दिलाती हों, लेकिन सियाचीन में जवानों के लिए जिंदगी जहन्नुम से कम नहीं है। सियाचीन विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है और भारत-पाकिस्तान दोनों के लिए सामरिक तौर पर बहुत अहम माना जाता है।
- सियाचीन में भारत के करीब 10 हजार सैनिक तैनात हैं
- यहां जवानों की पोस्टिंग 3 महीने के लिए होती है
- 3 महीने तक जवानों के लिए नहाना और शेविंग मुमकिन नहीं होता
- यहां तैनात जवान बर्फ को पिघलाकर पानी पीते हैं
- हजारों फीट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी होती है
- भयानक ठंड की वजह से हाथ पैरों में गलन हो जाती है
- 1984 के बाद से अब तक यहां 869 से जवानों की मौत हो चुकी है
यानी सियाचिन में दुश्मनों की गोलियों से ज्यादा ख़तरा माइनस 40 से माइस 60 डिग्री की ठंड और अचानक आने वाले एवलांच हैं।
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