मुंबई: सहायक उपनिरीक्षक (ASI) अर्चना पाटिल को इन दिनों उपनगरीय क्षेत्र चेंबूर की स्लम बस्तियों की कई महिलाएं दीदी कहने लगी हैं जो आमतौर पर पुलिसकर्मियों से अपनी समस्याएं साझा करने से हिचकती थीं। मुंबई पुलिस की परियोजना पुलिस दीदी के कारण महिलाओं की यह झिझक दूर हो रही हैं। अर्चना पाटिल की तरह एक हजार से अधिक ऐसी पुलिस दीदी हैं जो अपने आधिकारिक कार्यघंटे के बाद मलिन बस्तियों में बच्चियों और सभी उम्र की महिलाओं से मिलती हैं।
पुलिस दीदी परियोजना के तहत ये महिला अधिकारी मलिन बस्तियों में जाकर लडकियों और महिलाओं से मिलती हैं और उनकी समस्याओं खासकर यौन उत्पीड़न से संबंधित परेशानियों के बारे में उनसे बातचीत करती हैं। शहर के कुछ गैरसरकारी संगठनों (NGO) के सहयोग से करीब दो साल पहले शुरू की गयी इस परियोजना में नगर के 93 थानों की महिलाकर्मियों को शामिल किया गया है। उनमें से अधिकतर कांस्टेबल हैं और कुछ एएसआई स्तर की अधिकारी भी हैं।
मुंबई पुलिस के उप आयुक्त (आपरेशन) अशोक दूधे ने कहा कि अब झुग्गी में रह रही महिलाएं आगे आ रही हैं और विश्वासपूर्वक अपनी समस्याएं साझा कर रही हैं। इन समस्याओं में यौन उत्पीड़न भी शामिल है। उन्होंने कहा कि यह तभी संभव हो सका है क्योंकि हमारी प्रशिक्षित महिला कांस्टेबलों ने उनके साथ नियमित मुलाकात के जरिए सद्भाव स्थापित किया है।
शुरुआत में हर थाने से 8-10 महिला कर्मियों को चुना गया और उन्हें प्रशिक्षित किया गया कि वे किस प्रकार यौन दुर्व्यवहार के संबंध में बातचीत करेंगे। उन्होंने कहा कि इस परियेाजना की शुरूआत बाल यौन उत्पीड़न पर काबू के मकसद से की गयी थी। इसकी शुरूआत पहले उन इलाकों में की गयी जहां ऐसे मामले अधिक होते थे।
दूधे मुंबई पुलिस के प्रवक्ता भी हैं। उन्हौंने कहा कि प्रशिक्षण के बाद महिला कर्मियों को अपने क्षेत्र के तहत आने वाले निजी तथा नगर निकाय के स्कूलों में जाने तथा वहां बच्चियों से बातचीत करने को कहा गया। पुलिस दीदी अपने आसपास के क्षेत्रों में पुरूषों की गतिविधियों पर भी करीबी नजर रखती हैं। उन्होंने कहा कि नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के करीब 90 प्रतिशत मामलो में अपराधी पीडि़त का परिचित होता है। इसलिए हम लड़कियों और उनकी माताओं को भी जागरूक कर रहे हैं।
दूधे के अनुसार इस परियोजना के कारण, बच्चों का यौन अपराधों से बचाव कानून (पोक्सो) के तहत दर्ज मामलों में खासी कमी आयी है। चेंबूर पुलिस स्टेशन में एएसआई अर्चना पाटिल ने परियोजना को पुलिस की सामाजिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा, मैं पिछले एक साल से इससे जुड़ी हुयी हूं और मैंने महसूस किया है कि उन लोगों की मानसिकता में खासा बदलाव आया है। अब वे खुले मन से अपनी समस्याएं साझा कर रही हैं।