नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने केरल में सिर्फ पांच सितारा होटलों को ही बार लाइसेंस देने की राज्य सरकारी शराब नीति को आज बरकरार रखा। न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति शिव कीर्ति सिंह की पीठ ने केरल बार मालिकों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। बार मालिकों ने राज्य सरकार की शराब नीति को चुनौती देते हुये दावा किया था कि यह पक्षपातपूर्ण है।
इससे पहले, उच्च न्यायालय ने भी राज्य सरकार की शराब नीति को सही ठहराया था। राज्य सरकार की इस नीति का उद्देश्य 2023 तक केरल को शराब मुक्त राज्य बनाना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस नीति की वजह से रोजगार गंवाने वाले लोगों के पुनर्वास के लिये राज्य सरकार उपाय करने पर विचार करेगी।
न्यायालय ने इस मामले में अगस्त में सुनवाई पूरी करने के बाद कहा था कि निर्णय बाद में सुना जाएगा। न्यायालय ने न्यायमूर्ति सेन के सेवानिवृत्त होने से एक दिन पहले इस मामले में फैसला सुनाया।
बार मालिकों ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि सरकार की शराब नीति पक्षपात करने वाली है और इस वजह से सिर्फ सम्पन्न वर्ग की ही मदिरा तक पहुंच हो पाएगी। इसके विपरीत, राज्य सरकार का तर्क था कि बार मालिकों के लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करने का निर्णय नीतिगत है। बार मालिकों की दलील थी कि आंशिक प्रतिबंध की सरकार की नीति पक्षपातपूर्ण है।
केरल उच्च न्यायालय ने 30 अक्तूबर, 2014 को राज्य में 700 से अधिक बार बंद करने लेकिन धरोहर की श्रेणी में आने वाले तथा सितारा और उससे उपर के होटलों को इसके दायरे से बाहर रखने के निर्णय को सही ठहराया था।