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'किसी महिला को 3 दिन के लिए अछूत नहीं माना जा सकता', जस्टिस नागरत्ना की अहम टिप्पणी

 Edited By: Khushbu Rawal
 Published : Apr 08, 2026 08:21 am IST,  Updated : Apr 08, 2026 08:21 am IST

सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने सुप्रीम कोर्ट में आर्टिकल 17 के लागू होने के सवाल पर अहम टिप्पणी की है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर CJI सूर्यकांत समेत 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही थी। जस्टिस नागरत्ना उसी की एक सदस्य हैं।

Justice Nagarathna- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट की जज बी.वी. नागरत्ना Image Source : PTI

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट की जज बी.वी. नागरत्ना ने सबरीमाला संदर्भ के दौरान कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि किसी महिला को महीने में 3 दिन "अछूत" माना जाए और फिर चौथे दिन अछूत मानना ​​बंद कर दिया जाए।

इन 9 जजों की बेंच कर रही सुनवाई

उनकी यह टिप्पणी तब आई जब 9 जजों की एक बेंच केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी। इस संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें 2018 के सबरीमाला फैसले में की गई उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति है, जिसमें कहा गया है कि 10-50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना 'अस्पृश्यता' का एक रूप है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन करता है। सबरीमाला मामले में, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ का मत था कि उम्र या मासिक धर्म की स्थिति के आधार पर महिलाओं को केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से रोकना "अस्पृश्यता" का एक रूप है जो उन्हें "अधीनस्थ" स्थिति में रखता है, "पितृसत्ता" को कायम रखता है और "उनकी गरिमा के लिए अपमानजनक" है। 

'सबरीमाला केस में आर्टिकल-17 पर बहस क्यों?'

तुषार मेहता ने कहा, "भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़िवादिता वाला देश नहीं है जितना पश्चिम समझता है।" जस्टिस नागरत्ना ने तब कहा, "सबरीमाला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 पर बहस कैसे की जा सकती है, यह मुझे समझ नहीं आता। एक महिला होने के नाते, मैं कह सकती हूं कि महिला को हर महीने तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता और चौथे दिन यह स्थिति खत्म नहीं हो सकती।”

'मासिक धर्म नहीं, आयु वर्ग के आधार पर प्रतिबंध'

वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में सरकार का रुख एकदम क्लीयर कर दिया है। उन्होंने कहा कि वह मासिक धर्म के मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का संबंध मासिक धर्म से नहीं है और यह प्रतिबंध केवल आयु वर्ग के आधार पर लगाया गया है। उन्होंने कहा, ''स्पष्ट कर दें। सबरीमाला मंदिर केवल एक विशेष आयु वर्ग के लिए है। इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। देश और दुनिया भर में भगवान अय्यप्पा के मंदिर सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुले हैं। यह केवल एक मंदिर है जहां यह रोक है। यह एक अनूठा मामला है।''

सितंबर 2018 में हुआ था बड़ा फैसला

इस मामले की सुनवाई फिलहाल जारी है। सितंबर 2018 में, 5 जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था और कहा था कि सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है। 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की एक अन्य बेंच ने 3:2 के बहुमत से विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था।

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