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अमेरिका के अकेले पड़ने से चीन की बढ़ती ताकत तक, जयशंकर ने खोल दिए पूरी दुनिया के धागे

 Written By: Vineet Kumar Singh
 Published : Oct 04, 2026 06:51 pm IST,  Updated : Oct 04, 2026 06:51 pm IST

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक राजनीति पर कहा कि अमेरिका की भूमिका में बदलाव और चीन के बढ़ते प्रभाव ने दुनिया का समीकरण बदल दिया है। उन्होंने बहुध्रुवीय व्यवस्था, रणनीतिक संतुलन और भारत-यूरोप सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर। Image Source : X.COM/DRSJAISHANKAR

Highlights

  • जयशंकर ने कहा, अमेरिका ने खुद को कुछ हद तक जानबूझकर अकेली ताकत बनाया है।
  • विदेश मंत्री बोले, अमेरिका-चीन की होड़ ने दुनिया में हर तरह के लीवरेज को हथियार बनाया।
  • भारत-ईयू FTA को जयशंकर ने रिश्तों के लिए बताया बड़ा गेम चेंजर।

नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक राजनीति की तस्वीर सामने रखते हुए कहा है कि दुनिया अब तेजी से ऐसे दौर में पहुंच रही है, जहां अमेरिका की भूमिका बदल रही है और चीन लगातार मजबूत हो रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपनी पसंद से खुद को कुछ हद तक 'अकेली ताकत' बना लिया है, जबकि चीन का उभार वैश्विक समीकरणों को तेजी से बदल रहा है। जयशंकर ने कहा कि अमेरिका-चीन की होड़ अब सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं है। इस प्रतिस्पर्धा ने दुनिया के अलग-अलग देशों के पास मौजूद ताकत और साधनों को भी 'हथियार' बना दिया है।

'अमेरिका-चीन की होड़ ने बदला दुनिया का तरीका'

जयशंकर ने नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग 2026 के उद्घाटन सत्र में कहा कि आज की दुनिया की सबसे बड़ी विशेषता अमेरिका का 'रेडिकल रीपोजिशनिंग' यानी अपनी वैश्विक भूमिका में बड़ा बदलाव है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अमेरिका की अपनी पसंद है और इसी वजह से वह एक तरह से जानबूझकर 'अकेली ताकत' बन गया है। दूसरी बड़ी बात चीन का उभार है। चीन खुद को एक खास और विशिष्ट देश मानता है और कई मायनों में उसकी स्थिति भी ऐसी है। जयशंकर ने कहा कि इन दोनों के बीच तेज प्रतिस्पर्धा है, जो पूरी दुनिया के रिश्तों और फैसलों को प्रभावित कर रही है।

'हर देश अपने पास मौजूद ताकत का कर रहा इस्तेमाल'

जयशंकर ने कहा कि मौजूदा प्रतिस्पर्धा सिर्फ अमेरिका और चीन के बीच नहीं है। इसका असर दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ रहा है। उनके मुताबिक, आज जिस देश के पास जो भी मजबूत साधन या फायदा है, वह उसे अपने हित में इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी लेन-देन में सप्लायर के पास ज्यादा ताकत है या खरीदार के पास? उत्पादन पर नियंत्रण ज्यादा महत्वपूर्ण है या किसी बड़े बाजार में हिस्सेदारी? खरीदने की क्षमता किसके पास ज्यादा है? जयशंकर ने कहा कि जिस खिलाड़ी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में ज्यादा नियंत्रण, प्रतिबद्धता और फैसले लेने की क्षमता होगी, वही अपने प्रभाव का बेहतर इस्तेमाल कर पाएगा।

'दुनिया को न तो बहुत गर्म, न ही बहुत ठंडा चाहिए'

अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा के बीच जयशंकर ने 'गोल्डीलॉक्स' जैसी स्थिति की बात कही। उनका मतलब ऐसी व्यवस्था से था, जो न तो बहुत तनावपूर्ण हो और न ही इतनी ढीली कि किसी एक शक्ति का दबदबा बन जाए। उन्होंने कहा कि दुनिया को सही संतुलन वाली स्थिति चाहिए। जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियां अब किसी एक खेमे में पूरी तरह जाने के बजाय अपने हितों के हिसाब से अलग-अलग देशों के साथ संबंध बना रही हैं। इसे उन्होंने रणनीतिक संतुलन और 'हेजिंग' की नीति बताया। इन देशों का लक्ष्य अपनी अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, तकनीक और सप्लाई चेन को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बनाना है।

उभरते देशों को जयशंकर ने दिया बेहद अहम संदेश

जयशंकर ने कहा कि उभरते और मध्यम देशों के सामने सहयोग का बड़ा अवसर है। दुनिया बदल रही है, उसका एजेंडा, वैश्विक ढांचा और काम करने का तरीका भी बदल रहा है। ऐसे में इन देशों को शांति और सुरक्षा, सप्लाई चेन, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी, जलवायु, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में साथ काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर दुनिया में कहीं संघर्ष या तनाव है तो बड़ी शक्तियों के अलावा दूसरे देश भी अपने संसाधन जोड़कर एक-दूसरे की कूटनीति का समर्थन कर सकते हैं। उनके अनुसार, सभी मुद्दों पर एक जैसी सोच जरूरी नहीं है; साझा हितों के कुछ बिंदु भी सहयोग के लिए पर्याप्त हैं।

'दुनिया के छोटे देश भी बन सकते हैं बड़े खिलाड़ी'

विदेश मंत्री ने कहा कि किसी क्षेत्र में प्रभावी बनने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा देश होना जरूरी नहीं है। उन्होंने सेमीकंडक्टर और मशीन निर्माण का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमताएं गैर-महाशक्तियों के पास हैं। ताइवान की TSMC अत्याधुनिक चिप निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण है, जबकि नीदरलैंड की ASML उन्नत चिप बनाने वाली मशीनों के क्षेत्र में निर्णायक भूमिका रखती है। स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भी उन्होंने दवाओं और Active Pharmaceutical Ingredients यानी API के उत्पादन को अलग-अलग देशों में फैलाने की जरूरत बताई। कोरोना महामारी ने एक ही जगह पर निर्भर सप्लाई चेन की कमजोरियां दिखा दी थीं।

'क्वाड, ब्रिक्स और दूसरे समूह बन रहे नए रास्ते'

जयशंकर ने कहा कि बदलती दुनिया में कई देश अपने साझा हितों के आधार पर नए सहयोग बना रहे हैं। उन्होंने क्वाड का उदाहरण देते हुए कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियों के बीच इस तरह के सहयोग बढ़ रहे हैं। कनेक्टिविटी के क्षेत्र में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और नॉर्दर्न सी रूट जैसे रास्ते महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने ब्रिक्स को भी ऐसा मंच बताया, जहां अलग-अलग देश महसूस करते हैं कि उनकी सामूहिक आवाज अकेले देश की आवाज से ज्यादा मजबूत होती है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी उन्होंने भारत की पहल से बने सफल उदाहरण बताया।

भारत-यूरोप रिश्तों में FTA की भूमिका पर दिया बयान

जयशंकर ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते यानी FTA को रिश्तों के लिए “रियल गेम चेंजर” बताया। उन्होंने कहा कि व्यापार समझौता होने से सिर्फ कारोबार नहीं बढ़ेगा, बल्कि दोनों पक्षों के कारोबारी, नियामक संस्थान और अधिकारी एक-दूसरे को बेहतर समझ पाएंगे। इससे पूरे रिश्ते पर व्यापक असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भारत और यूरोप के बीच तकनीक, इनोवेशन, सेमीकंडक्टर, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और लाइफ साइंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ सकता है। AI के मुद्दे पर भी भारत और यूरोप की सोच में काफी समानता है। उन्होंने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों को दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक महत्वपूर्ण पुल बताया।

रक्षा, अंतरिक्ष और क्लीन एनर्जी पर क्या बोले जयशंकर

जयशंकर ने कहा कि यूरोप अपनी अंतरिक्ष क्षमता को मजबूत करना चाहता है और भारत भी इस क्षेत्र में अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत अब अंतरिक्ष प्रक्षेपण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी क्षमता और बुनियादी ढांचा तेजी से बढ़ा रहा है। रक्षा क्षेत्र में भी यूरोप अपनी इंडस्ट्री को फिर से मजबूत करना चाहता है। जयशंकर ने कहा कि भारत के कई स्टार्टअप विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर रहे हैं और भारतीय रक्षा निर्यात भी तेजी से बढ़ रहा है। जलवायु के मुद्दे पर उन्होंने यूरोप की तकनीक और कारोबारी विशेषज्ञता को महत्वपूर्ण बताया और भारत में यूरोपीय नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियों के निवेश की जरूरत पर जोर दिया।

भारत समेत मध्यम शक्तियां अब ज्यादा जिम्मेदारी उठाएं

जयशंकर ने कहा कि पुरानी वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका ने लंबे समय तक काफी हद तक संभाला, लेकिन अब उसकी भूमिका और जिम्मेदारी कम होती दिखाई दे रही है। इससे दुनिया में कुछ खाली जगहें बनी हैं, जिन्हें उभरती शक्तियों को भरना होगा। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक कद बढ़ रहा है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी और योगदान भी बढ़ना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि समाधान UN को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाना है। उनके मुताबिक, अगर दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है तो यह बदलाव केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह सकता। भारत और यूरोप के बीच इस पर ज्यादा बातचीत जरूरी होगी।

'बहुध्रुवीय दुनिया में एक ही खेमे की राजनीति कमजोर'

जयशंकर ने कहा कि आज कई देश ऐसे साझेदारों के साथ भी संबंध बना रहे हैं, जिनके साथ सभी मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं है। फिर भी ये रिश्ते वास्तविक जरूरतों के कारण बनाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ के उभरते देशों में अंतर जरूर है, लेकिन दोनों में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ाने की इच्छा समान है। ये देश जोखिम कम करने, आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और अपने हितों के मुताबिक नए सहयोग तैयार करने पर ध्यान दे रहे हैं। बता दें कि जयशंकर ने हाल ही में भारत और चीन के सुधरते रिश्तों पर भी बेहद अहम बयान दिया था। (ANI से इनपुट्स के साथ)

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