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खाद्य महंगाई में राहत मिलने की दिख रही उम्मीद, अगस्त में अनाज, दाल और खाद्य तेल के दाम में नरमी

 Edited By: Sourabha Suman
 Published : Aug 19, 2024 09:50 pm IST,  Updated : Aug 19, 2024 09:50 pm IST

अगस्त महीने में खाद्य वस्तुओं के दाम के आंकड़ों से पता चलता है कि अनाज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में व्यापक स्तर पर नरमी आई है। सब्जियों में आलू के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं जबकि प्याज तथा टमाटर के दाम में कमी आई है।

मौद्रिक नीति के तहत महंगाई में कमी लाने के उपायों से यह काबू में है।- India TV Hindi
मौद्रिक नीति के तहत महंगाई में कमी लाने के उपायों से यह काबू में है। Image Source : PIXABAY

खाद्य महंगाई में कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। अर्थव्यवस्था की स्थिति पर सोमवार को जारी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बुलेटिन में कहा गया है कि अनाज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में अगस्त में व्यापक स्तर पर नरमी देखी गई है। अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में सालाना बदलाव के आधार पर मापी जाने वाली सकल (हेडलाइन) मुद्रास्फीति बीते माह जुलाई में घटकर 3.5 प्रतिशत पर आ गयी जो जून में 5.1 प्रतिशत थी। भाषा की खबर के मुताबिक, रिजर्व बैंक के अगस्त माह के बुलेटिन में कहा गया है कि महंगाई दर में 1.54 प्रतिशत की कमी का कारण 2.9 प्रतिशत का अनुकूल तुलनात्मक आधार है। इससे 1.4 प्रतिशत से अधिक का सकारात्मक असर पड़ा है।

आलू के दाम लगातार ऊंचे

खबर के मुताबिक, रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा की अगुवाई वाली टीम के लिखे लेख में कहा गया है कि अगस्त महीने में अबतक (12 तक) खाद्य वस्तुओं के दाम के आंकड़ों से पता चलता है कि अनाज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में व्यापक स्तर पर नरमी आई है। सब्जियों में आलू के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं जबकि प्याज तथा टमाटर के दाम में कमी आई है। बुलेटिन में- क्या खाद्य कीमतों का असर अन्य क्षेत्रों पर हो रहा है? शीर्षक से लिखे लेख में कहा गया है कि 2022-23 से मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति में कमी आ रही है। इसका कारण मुख्य रूप से मौद्रिक नीति उपायों, रुख और लागत आधारित झटकों में कमी के कारण है। हालांकि, इन वर्षों में खाद्य कीमतों में तेजी मुख्य मुद्रास्फीति पर उल्टा दबाव डाल रही हैं, लेकिन मौद्रिक नीति के तहत महंगाई में कमी लाने के उपायों से यह काबू में है।

मुख्य और सकल मुद्रास्फीति के बढ़ने का जोखिम

पात्रा, जॉयस जॉन और आशीष थॉमस जॉर्ज के लिखे लेख में कहा गया है क्या महंगाई में कमी लाने के उपायों को हल्का करना चाहिए? सकल मांग बढ़ रही है। इसके साथ, वैश्विक स्तर पर जारी तनाव के बीच लागत आधारित जोखिम भी है। इसको देखते हुए मुख्य और सकल मुद्रास्फीति के बढ़ने का जोखिम है और यह नियंत्रण से बाहर जा सकता है। लेखकों के मुताबिक, अगर खाद्य कीमतों का दबाव बना रहता है और दूसरे क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है, तो एक सतर्क मौद्रिक नीति दृष्टिकोण जरूरी है। परंपरागत रूप से मौद्रिक नीति पर विचार करते समय यह माना जाता था कि खाद्य वस्तुओं के दाम में तेजी अस्थायी है, लेकिन अब स्थिति बदल रही है कई मामलों में खाद्य महंगाई दर लंबे समय से बनी हुई है।

खाद्य महंगाई बनी हुई है और यह चिंताजनक

कीमत में तेजी के बाद भी खाने के सामान की मांग बनी हुई है, इससे खाद्य महंगाई बनी हुई है और यह चिंताजनक है। इसका लागत, सेवा शुल्क और उत्पादन के दाम पर असर हो सकता है। यानी खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ा है। इसमें कहा गया है कि खाद्य कीमतों के तेजी का स्रोत मौद्रिक नीति के दायरे से बाहर हो सकता है, लेकिन जब खाद्य मुद्रास्फीति के कारण महंगाई दूसरे क्षेत्रों में फैलती है, तो इसपर काबू पाने के लिए मौद्रिक नीति के तहत कदम उठाने की जरूरत होती है। यह कीमत स्थिरता और भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है। केंद्रीय बैंक ने यह साफ किया है कि बुलेटिन में प्रकाशित लेख लेखकों के विचार हैं और वह रिजर्व बैंक के विचारों से मेल नहीं खाते हैं।

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