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विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के दिन जरूर करें इस कथा का पाठ, तभी मिलेगा व्रत और पूजा का पूर्ण फल

 Written By: Vineeta Mandal
 Published : Sep 28, 2026 09:30 pm IST,  Updated : Sep 28, 2026 09:30 pm IST

आश्विन माह की चतुर्थी को विघ्नराज संकटी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इस दिन व्रत करने के साथ गणपति जी की उपासना की जाती है। इसके अलावा व्रत के दौरान पूजा के साथ विघ्नराज संकटी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करना या सुनने से विघ्नकर्ता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026- India TV Hindi
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026 Image Source : PEXELS

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने का विधान है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणपति जी की पूजा-अर्चना करने से भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। इस भक्तगण व्रत रखते हैं और गणेश जी के विघ्नराज स्वरूप की पूजा करते हैं। संकष्टी चतुर्थी व्रत का पारण चंद्रदोय के बाद चंद्रमा की पूजा के बाद किया जाता है। वहीं अगर आप विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर रहे हैं तो इस पौराणिक कथा का पाठ जरूर करें, तभी व्रत का पूरा फल प्राप्त होगा।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार,  एक समय की बात है कि बाणासुर की कन्या उषा शयन कर रही थी। उसने सुषुप्तावस्था में अनिरुद्ध का स्वप्न देखा,  अनिरुद्ध से अलग होने की वजह से वह इतनी अभिलाषी हो गई कि उसके चित को किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिल रही थी। उसने अपनी सहेली चित्रलेखा से त्रिभुवन में रहने वाले सभी लोगों के चित्र बनवाए। जब चित्र में उसने अनिरुद्ध को देखा तो कहा मैंने उस व्यक्ति को अपने सपने में देखा था। इसी के साथ मेरा पाणिग्रहण भी हुआ था। उसने अपनी सहेली से कहा कि हे सखी! यह व्यक्ति जहां कही भी हो इसे ढूंढ लाओ। अन्यथा इसके वियोग में मैं अपने प्राण त्याग दूंगी। अपनी सखी के कहे अनुसार चित्रलेखा अनेक स्थानों पर खोज करती हुई द्वारकापुरी में आ पहुंची। चित्रलेखा को राक्षसी माया का ज्ञान था उसने वहां अनिरुद्ध को पहचान कर उसका अपहरण कर लिया और रात के समय में पलंग सहित अनिरुद्ध को उठाकर वह बाणासुर की नगरी में प्रविष्ट हुई।

इधर प्रद्युम्न पुत्र शोक के कारण असाध्य रोग से ग्रसित हो गया। अपने पुत्र प्रद्यम्न और पौत्र अनिरुद्ध की घटना से कृष्ण जी भी व्याकुल हो उठे। रुक्मिणी भी दुःखी होकर बिलखने लगीं और खिन्न मन से कृष्ण जी से कहने लगी, हे नाथ! हमारे प्रिय पौत्र का किसी ने हरण किया है? या वह अपनी इच्छा से ही कहीं गया है। मैं शोकाकुल हो आपके सामने ही अपने प्राण छोड़ दूंगी। रुक्मिणी की बातें सुनकर श्रीकृष्ण जी यादवों की सभा में उपस्थित हुए। वहां उन्होंने लोमश ऋषि के दर्शन किए। श्रीकृष्ण ने सारी घटना ऋषि को सुना दी।श्रीकृष्ण ने लोमश ऋषि से पूछा कि, हे मुनिवर! हमारे पौत्र को कौन लेकर गया है? या कहीं वह स्वयं ही तो नहीं चला गया है? उसकी माता पुत्र वियोग के कारण बहुत दुखी हैं।

लोमश मुनि ने कहा, हे कृष्ण! बाणासुर की कन्या उषा की सहेली चित्रलेखा ने उसका अपहरण किया हैं और उसे बाणासुर के महल में छिपा कर रखा है। आप आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का अनुष्ठान कीजिए। इस व्रत के करने से आपका पौत्र आपको अवश्य ही मिल जाएगा। श्री कृष्ण जी ने लोमश ऋषि के कहे अनुसार व्रत किया और इस व्रत के प्रभाव से उन्होंने बाणासुर को परास्त कर दिया। भगवान कृष्ण ने बाणासुर की सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। ऐसी सफलता मिलने का कारण व्रत का प्रभाव ही था। कहते हैं ये व्रत संपूर्ण विपत्तियों के का विनाश करता है। इस व्रत की महिमा का वर्णन बड़े-बड़े विद्वान भी नहीं कर सकते।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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