अघोर पंथ में बाबा किनाराम का अपना अलग ही महत्व है। अघोराचार्य बाबा कीनाराम सन 1609 से 1769 तक बाबा अघोर संप्रदाय के अनन्य आचार्य थे। माना जाता है कि इनका जन्म 1609 में चंदौली के रामगढ़ गांव में हुआ था। बाबा बचपन से ही संसार से विरक्त रहते थे। बाबा को कई सिद्धियां प्राप्त थी। उन्होंने अपने जीवन में कई चमत्कार किए हैं जिस कारण उन्हें अघोरी आज भी पूजते हैं।
पहले ही जान गए थे पत्नी की मौत की खबर
कहा जाता है कि बाबा किनाराम का विवाह 12 वर्ष की आयु में कर दिया गया था, जबकि बाबा विवाह के लिए राजी नहीं थे। एक दिन उन्होंने रात में अपनी मां से हठपूर्वक दूध-चावल मांग कर खाया और सुबह उनकी पत्नी की मौत की खबर आ गई, लोग अचरज में पड़ गए कि इन्हें पत्नी की मौत का आभास पहले कैसे हो गया। बता दें कि सनातन धर्म में मृतक संस्कार के बाद दूध-चावल एक कर्मकांड है।
मां गंगा ने खुद पखारे थे बाबा के पैर
इसके बाद बाबा कामेश्वर धाम में रामानुजी संप्रदाय के संत शिवाराम की शरण में गए। कुछ समय बाद दीक्षा देने के पहले महात्मा जी ने परीक्षा लेने के इरादे से किनाराम से स्नान ध्यान के सामान लेकर गंगातट पर चलने को कहा। फिर बाबा किनाराम पूजनादि की सामग्री लेकर गंगातट से कुछ दूर पहले ही रुक गए और गंगाजी को झुककर प्रणाम करने लगे। फिर जब सिर उठाया तब देखा कि गंगा का जल बढ़कर इनके चरणों तक आ गया। किनाराम ने इस घटना को गुरु की महिमा मानी। हालांकि शिवाराम जी दूर से यह सब देख रहे थे। उन्होंने बाबा किनाराम को असामान्य सिद्ध माना और दीक्षा मंत्र दिया।
जमीदार ने मांगी थी माफी
एक अन्य कहानी के मुताबिक, कामेश्वर धाम में साधना के दौरान एक दिन वह घूमते-घामते नईडीह गांव पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि एक वृद्धा बहुत रो रही थी। पूछने पर बताया कि उसके इकलौते पुत्र को लगान न देने की खातिर जमींदार के सिपाही पकड़ ले गए हैं। इसके बाद बाबा किनाराम उस वृद्धा के साथ जमींदार के द्वार पर पहुंचे और देखा कि उस लड़के को जमींदार ने धूप में बैठा राख है।
पहले किनाराम ने जमींदार से उसे मुक्त करने को कहा जब जमीदार नहीं माना और लगान को लेकर अड़ा रहा तो किनाराम ने जमींदार से कहा कि जहां लड़का बैठा है वहाँ की धरती खुदवा ले और जितना तेरा पैसा हो, वहां से ले ले। इसके बाद जमीदार ने उस जमीन पर खुदाई शुरू करवाई 2-3 फीट गहराई तक खुदवाने पर वहाँ काफी पैसे पड़े देखकर सब दंग रह गए। इसके बाद जमींदार ने लड़के को तुरंत बंधनमुक्त कर ही दिया, और कीनाराम बाबा से क्षमा मांगी। इसके बाद वृद्धा ने उस लड़के को किनाराम बाबा को ही सौंप दिया। उसका नाम बीजाराम था और किनाराम बाबा के समाधि पश्चात् वाराणसी के उनके मठ की गद्दी पर अधिष्ठित हुआ।
अघोर साधक मानते हैं कि बाबा किनाराम को सिद्धियां प्राप्त थीं, इस कारण वे बाबा किनाराम को आज भी खूब मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)