Dhakeshwari temple: हिंदू धर्म में शक्तिपीठ मंदिरों का विशेष महत्व महत्व बताया गया है। नवरात्रि के दौरान शक्तिपीठ मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। 51 शक्तिपीठ में कई शक्तिपीठ मंदिर भारत के अलावा बाहरी देशों में भी है। इनमें से एक ढाकेश्वरी देवी मंदिर बांग्लादेश के ढाका में स्थित है। यह बांग्लादेश का राष्ट्रीय मंदिर है। ढाकेश्वरी का अर्थ होता ढाका की देवी। मान्यता है कि बांग्लादेश के ढाका शहर का नाम ढाकेश्वरी देवी के नाम पर ही पड़ा है। तो चलिए जानते हैं ढाकेश्वरी देवी मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में।
बांग्लादेश, ढाकेश्वरी देवी मंदिर
बांग्लादेश में स्थित ढाकेश्वरी देवी मंदिर माता सती को समर्पित है। यहां विराजमान देवी को शक्ति का स्वरूप माना जाता है और भक्त उन्हें मां ढाकेश्वरी के नाम से पुकारते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां माता रानी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्तगण आते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां माता सती के मुकुट का रत्न गिरा था। ढाकेश्वरी देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर बांग्लादेश के हिंदुओं की नहीं बल्कि दुनियाभर के करोड़ों हिंदुओं के लिए आस्था का एक बड़ा केंद्र है।
ढाकेश्वरी मंदिर का इतिहास
जानकारी के मुताबिक, ढाकेश्वरी मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा बल्लाल सेन ने करवाया था। सन् 1996 में इस मंदिर को 'ढाकेश्वरी राष्ट्रीय मंदिर' का दर्जा मिला। 1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मंदिर कई बार क्षतिग्रस्त हुआ लेकिन बार-बार पुनर्निर्मित किया गया। प्राचीन मूर्ति को विभाजन के समय सुरक्षा कारणों से पश्चिम बंगाल ले जाया गया था और अब यहां उसकी प्रतिकृति स्थापित है। देवी की यह प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी रूप में है, जिनके साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक की मूर्तियां भी विराजमान हैं। नवरात्रि और अन्य पर्वों पर यहां विशेष अनुष्ठान होते हैं, जिनमें हजारों की संख्या में भक्त शामिल होते हैं।
शक्तिपीठ से जुड़ी मान्यताएं
शक्तिपीठ हिंदू धर्म के पवित्र स्थल हैं। बता दें कि माता सती के शरीर के अंग या आभूषण जहां-जहां गिरा था उस जगह को शक्तिपीठ कहा जाता है। हिंदू धर्म में शक्तिपीठ को अत्यंत ही पवित्र स्थल पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती के पिता दक्ष प्रजापति ने महायज्ञ का आयोजन करवाया था, जिसमें भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया गया। तब माता सती वहां पर पहुंचकर अपने पिता से महादेव की नहीं बुलाने का कारण पूछने लगी। जवाब देने की जगह दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया और उनके लिए अपशब्द कहे। अपने पति के अपमान से दुखी और क्रोधित माता सती ने उसी अग्निकुंड में कूद कर अपने प्राणों की आहूति दे दी। इस घटना की खबर जब महादेव भोलेनाथ को लगी तो उन्होंने क्रोध में अपनी तीसरी नेत्र खोल ली और तांडव करने लगे। इसके बाद वो दक्ष के महल पहुंचे और माता सती का शव कंधे पर लेकर कैलाश की ओर जाने लगे। प्रथ्वी पर बढ़ते खतरे के काल को देखते हुए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इस तरह मां सती के शरीर के हिस्से जिन-जिन जगहों पर गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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