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Falgun Amavasya 2026: फाल्गुन अमावस्या के दिन करें पितृ स्तोत्र और कवच का पाठ, दूर होगा हर दोष, पितरों का मिलेगा आशीर्वाद

 Written By: Vineeta Mandal
 Published : Feb 15, 2026 11:45 pm IST,  Updated : Feb 15, 2026 11:45 pm IST

Falgun Amavasya 2026: अमावस्या के दिन पितृ स्तोत्र और कवच का पाठ करें। ऐसा करने से पितृ दोष से छुटकारा मिलेगा साथ ही पूर्वजों का भी आशीर्वाद प्राप्त होगा।

फाल्गुन अमावस्या 2026- India TV Hindi
फाल्गुन अमावस्या 2026 Image Source : PEXELS

Falgun Amavasya 2026: इस साल फाल्गुन अमावस्या 17 फरवरी को है। शास्त्रों में फाल्गुन महीने में आने वाली इस अमावस्या को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। फाल्गुन अमावस्या के दिन गंगा स्नान और दान-पुण्य करना शुभफल देने वाला माना जाता है। इसके साथ ही अमावस्या के दिन पितरों का पिंडदान और तर्पण भी किया जाता है। ऐसा करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और पूर्वज अपने वंशजों को आशीर्वाद भी देते हैं। इसके साथ ही अमावस्या के दिन अगर पितृ निवारण स्तोत्र और कवच का पाठ करने से पितृ दोष दूर होते हैं और पूर्वजों की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पितृ निवारण स्तोत्र

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा ।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा ।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि: ।।

प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।।

तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ।।

पितृ कवच

कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम् द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः॥

तव भ्रमासऽ आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः॥

प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥

उदग्ने तिष्ठ प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते।
यो नोऽ अरातिम् समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम्॥

ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून्।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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