हिंदू धर्म में सर्वपितृ अमावस्या को अत्यंत ही पुण्यकारी माना गया है। इस दिन ब्राह्मण भोज, वस्त्रदान, तिलदा, जलदान, दीपदान और गाय को हरा चारा खिलाना फलदायी होता है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीविष्णुसहस्रनाम अथवा रुद्रपाठ का पाठ करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। इस दिन किया गया श्राद्ध कर्म व्यक्ति को पितृ ऋण से मुक्त करता है और परिवार में सुख-समृद्धि, खुशहाली का आगमन होता है। सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष की अंतिम तिथि होती है, जिसे सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के श्राद्ध के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है।
गरुड़पुराण के अनुसार अनुसार यदि किसी व्यक्ति को अपने पितरों की मृत्यु तिथि मालूम न हो या तिथि विशेष पर श्राद्ध करने में असमर्थ हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में पितृगण पृथ्वीलोक पर आते हैं और अमावस्या को विदा होते हैं। ऐसे में इस दिन विधिपूर्वक किया गया श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान समस्त पितरों की तृप्ति के लिए किया जाता है, चाहे वे ज्ञात हों या अज्ञात। इसके अलावा जिनका विधिवत् अन्त्येष्टि संस्कार संभव नहीं हो पाया है उनका श्राद्ध भी इस तिथि को करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।
पितृ पक्ष का अंतिम श्राद्ध कब किया जाएगा?
पितृ पक्ष 10 अक्टूबर 2026 को आश्विन अमावस्या के दिन समाप्त हो जाएगा। इसी दिन पितरों का अंतिम श्राद्ध किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का प्रारंभ 9 अक्टूबर को रात बजकर 35 मिनट पर होगा। अमावस्या तिथि का समापन 10 अक्टूबर को रात 9 बजकर 19 मिनट पर होगा। आश्विन अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। बिहार के गया जी के इस मंदिर में लोग जीवित रहते हुए अपना पिंडदान और श्राद्ध कर लेते हैं। बता दें कि मृत्यु के बाद अगर किसी का पिंडदान और तर्पण नहीं जाता है तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है और धरती पर ही भटकती रहती है।
अमावस्या श्राद्ध का धार्मिक महत्व
अमावस्या तिथि श्राद्ध परिवार के उन मृतक सदस्यों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि के दिन हुई हो। अमावस्या तिथि पर किया गया श्राद्ध, परिवार के सभी पूर्वजों की आत्माओं को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त माना जाता है। जिन पूर्वजों की पुण्यतिथि ज्ञात नहीं है, उनका श्राद्ध भी अमावस्या तिथि पर किया जा सकता है। इसलिए अमावस्या श्राद्ध को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
अंतिम श्राद्ध या सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों के श्राद्ध का मुहूर्त
पितृ पक्ष श्राद्ध पार्वण श्राद्ध होते हैं। इन श्राद्धों को संपन्न करने के लिए कुतुप, रौहिण आदि मुहूर्त शुभ मुहूर्त माने गये हैं। अपराह्न काल समाप्त होने तक श्राद्ध संबंधीअनुष्ठान संपन्न कर लेने चाहिए। श्राद्ध के अंत में पितरों का तर्पण किया जाता है।
- कुतुप मूहूर्त - 12:02 पी एम से 12:49 पी एम
- रौहिण मूहूर्त - 12:49 पी एम से 01:36 पी एम
- अपराह्न काल - 01:36 पी एम से 03:58 पी एम
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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