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ऋषि पंचमी व्रत की विधि क्या है, महिलाओं के लिए क्यों खास है ये दिन? जानें महत्व और कैसे करें पूजा

 Written By: Arti Azad
 Published : Sep 11, 2026 02:55 pm IST,  Updated : Sep 11, 2026 02:55 pm IST

ऋषि पंचमी के व्रत से जुड़ी कुछ परंपराएं बेहद पुरानी हैं। सप्तऋषियों की पूजा के साथ इस दिन शुद्धि, क्षमा और प्रायश्चित की भावना जुड़ी हुई है, जिसकी वजह से महिलाओं में इस व्रत को लेकर खास आस्था देखने को मिलती है।

Rishi Panchami Puja Vidhi- India TV Hindi
ऋषि पंचमी पूजा की विधि Image Source : PINTEREST

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाने वाली ऋषि पंचमी इस बार 15 सितंबर 2026 को है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने की परंपरा है और खास तौर पर कई महिलाएं यह व्रत रखती हैं। इस व्रत को शुद्धि और प्रायश्चित से जोड़कर देखा जाता है। आइए जानते हैं ऋषि पंचमी पर पूजा कैसे की जाती है और महिलाओं के लिए यह व्रत क्यों खास माना जाता है।

कब मनाई जाएगी ऋषि पंचमी?

हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी मनाई जाती है। इस बार ऋषि पंचमी का पर्व 15 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ समेत सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है। कुछ परंपराओं में वशिष्ठ ऋषि की पत्नी अरुंधती का भी स्मरण किया जाता है।

महिलाओं के लिए क्यों खास?

पुरानी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रजस्वला अवस्था में निर्धारित नियमों का अनजाने में उल्लंघन हो जाने पर धार्मिक दोष माना जाता था। इसी अवधारणा से 'रजस्वला दोष' और उससे मुक्ति के लिए प्रायश्चित की परंपरा जुड़ी।

इसी वजह से इस दिन व्रत रखकर महिलाएं जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगती हैं। इस उपवास को किसी खास मनोकामना की पूर्ति वाला व्रत नहीं, बल्कि शुद्धि और प्रायश्चित का व्रत कहा जाता है। हालांकि, पुरुष भी इस व्रत को रख सकते हैं।

दातुन और स्नान से करें शुरुआत

ऋषि पंचमी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान की तैयारी करें। इस दिन अपामार्ग यानी चिरचिटा के पौधे के तने की दातुन से दांत साफ करने की परंपरा है। व्रत की पारंपरिक विधि में 108 दातुन करने का उल्लेख मिलता है। इस्तेमाल की गई 108 दातुनों को अपने सिर पर रखें और किसी पात्र से 108 बार सिर पर पानी डालकर स्नान करें। इसके बाद साफ पानी से सामान्य रूप से भी स्नान किया जा सकता है। वहीं, मिट्टी, गाय के गोबर, आंवला और तुलसी दल का प्रयोग कर स्नान करने की परंपरा भी मिलती है। कई लोग इन विधियों को प्रतीकात्मक रूप से करते हैं।

सप्तऋषियों की पूजा

पूजा से पहले घर और मंदिर की सफाई करें। लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर हल्दी, कुमकुम या रोली से मंडल बनाएं। इसके बाद सप्तऋषियों के प्रतीक के रूप में तस्वीर, 7 सुपारी या 7 कुश के गट्ठे रखे जा सकते हैं। कुछ परंपराओं में देवी अरुंधती और अपने गुरु की तस्वीर भी साथ रखी जाती है।

अर्घ्य और मंत्र

सप्तऋषियों के प्रतीक पर पहले शुद्ध जल और फिर पंचामृत अर्पित करें। इसके बाद चंदन, अक्षत, फूल, माला और धूप अर्पित करके घी का दीपक जलाएं। मौसमी फल और पंचमेवा नैवेद्य में रखें। सप्तऋषि मंत्र का जाप करते हुए अर्घ्य दिया जाता है। इस साल पूजा का शुभ समय सुबह 11 बजकर 7 मिनट से दोपहर 1 बजकर 33 मिनट तक बताया जा रहा है। 

कथा और क्षमा प्रार्थना

ऋषि पंचमी की कथा पढ़ें या सुनें और आरती करें। इसके बाद पूरे साल जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए सप्तऋषियों से ईमानदारी से क्षमा मांगी जाती है। अंत में प्रसाद बांटें। अपने सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मण को भोजन कराने या दान करने की भी परंपरा है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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