रुद्राष्टक की उत्पत्ति की कथा बेहद दिव्य और कल्याणकारी है। इसका वर्णन तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड में आता है जब काकभुशुण्डि जी गरूड़ जी को अपने पिछले जन्म की कथा सुनाते हैं। इस कथा के अनुसार, कागभुशुंडि जी अपने पिछले जन्म में भगवान शिव के परम भक्त थे। उनका जन्म अयोध्यापुरी में एक शूद्र के घर में हुआ था। उनकी महादेव में अटूट आस्था थी, लेकिन वे अन्य देवी-देवताओं की निंदा करते थे। एक समय अयोध्या में अकाल पड़ गया जिसके कारण उन्हें उज्जैन जाना पड़ा।
कागभुशुंडि जी को मिला शाप
उज्जैन में जाकर वह वहां एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करते हुये उन्हीं के साथ रहने लगे। एक बार कागभुशुंडि जी मंदिर में बैठकर शिव मंत्र का जाप कर रहे थे कि तभी उनके गुरुदेव वहां पहुंचे। लेकिन अभिमानवश कागभुशुंडि जी नेअपने गुरु को प्रणाम करने के लिए खड़े नहीं हुए। गुरु तो दयालु थे इसलिए उन्होंने उन्हें क्षमा कर दिया, लेकिन भगवान शिव इस पर क्रोधित हो गए। अपने भक्त द्वारा गुरु का यह अनादर भगवान शिव सहन न कर सके और उन्होंने कागभुशुंडि जी को शाप दे दिया। मंदिर में आकाशवाणी हुई कि, हे अभिमानी! तुमने अपने गुरु का निरादर किया है इसलिए अब तुझे सर्प की अधम योनि मिलेगी। सर्प योनि के बाद तू 1000 बार अनेकों योनि में जन्म लेगा।
शाप से मुक्ति और रुद्राष्टक की रचना
अपने शिष्य को मिले इस भयानक श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए कागभुशुंडि जी के गुरुदेव ने तुरंत हाथ जोड़कर भगवान शिव की एक अत्यंत अलौकिक स्तुति गाना शुरू कर दिया, यही स्तुति 'रुद्राष्टक' कहलायी। जिसका पाठ अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इस स्तुति से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने कागभुशुंडि का शाप वरदान में बदल दिया। शिवजी ने कहा कि मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा, इस शूद्र को 1000 बार जन्म अवश्य ही लेना पड़ेगा, लेकिन इसे जन्म-मरण का दुख नहीं होगा और इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण भी रहेगा। साथ ही भगवान शिव ने उन्हें श्री राम की भक्ति प्राप्त होने का भी आशीर्वाद दिया। इस तरह से कागभुशुंडि जी भगवान राम के परम भक्त बन गए और उनके गुरु द्वारा की गई क्षमा प्रार्थना से इस दिव्य स्तुति की उत्पत्ति हुई।
श्रीरुद्राष्टकम् लिरिक्स
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुंव्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पंनिरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥1॥
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयंगिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालंगुणागारसंसारपारं नतोऽहम्॥2॥
तुषाराद्रिसङ्काशगौरं गभीरंमनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गालसद्भालबालेन्दुकण्ठे भुजङ्गा॥3॥
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालंप्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियंशङ्करं सर्वनाथं भजामि॥4॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भंपरेशमखण्डमजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिंभजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥5॥
कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीदप्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दंभजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्तिसन्तापनाशंप्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥7॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजांनतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं प्रभोपाहि आपन्नमामीश शम्भो॥8॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तंविप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्यातेषां शम्भुः प्रसीदति॥9॥
॥ इति श्रीरामचरितमानसे उत्तरकाण्डे श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥
सावन में रुद्राष्टक पाठ के लाभ
कहते हैं सावन में रुद्राष्टक का पाठ करने से भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। साथ ही मानसिक अशांति और भय दूर हो जाता है। इतना ही नहीं इस स्तुति को पढ़ने से कुंडली के ग्रह दोष भी शांत होते हैं। साथ ही घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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