उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले का स्वार विधानसभा क्षेत्र यूपी की हॉट विधानसभा सीटों में से एक है। स्वार का सियासी इतिहास कई बड़े राजनीतिक बदलावों का साक्षी है। 2008 के परिसीमन के बाद चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में स्वार टांडा सीट, स्वार हो गई और इसका नंबर 20 से बदलकर 34 हो गया। यह एक सामान्य सीट है। स्वार की जनता की खासियत है कि पिछले 3 दशकों में जिसको भी सेवा का मौका दिया है, उसे लगातार कई बार सियासी मैदान में जिताया है। 1990 के दौर में स्वार सीट पर बीजेपी के विधायक शिव बहादुर सक्सेना का वर्चस्व था। वह लगातार 4 बार चुनाव जीते। फिर 2000 के दशक में स्वार की जनता ने लगातार तीन बार नवाब काजिम अली खान को विधायक चुना। 2017 में सपा के कद्दावर नेता आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान की स्वार से राजनीति में ग्रैंड लॉन्चिंग हुई और वह भी लगातर दो बार स्वार से विधायक बने। फिलहाल, ये सीट 2023 के उपचुनाव में पहली बार अपना दल (सोनेलाल) के पास चली गई। आइए स्वार के चुनावी इतिहास से समझिए कि स्वार का सियासी इतिहास क्या है और 2027 में यहां क्या समीकरण रहने वाला है।
1990 के दशक में दिखा BJP के शिव बहादुर सक्सेना का दबदबा
बात करें 1991 के विधानसभा चुनाव की तो यह चुनाव अयोध्या में गोलीकांड के बाद हुआ था। इस चुनाव में BJP ने शिव बहादुर सक्सेना को सियासी मैदान में उतारा था। और उन्हें टक्कर देने के लिए सामने थे कांग्रेस के निसार हुसैन और जनता दल के अब्दुल गफूर। 1991 का चुनाव त्रिकोणीय मुकाबला था। जिसमें शिव बहादुर सक्सेना ने 44 हजार 138 वोट हासिल कर कांग्रेस के निसार हुसैन को 11 हजार 529 वोटों के अंतर से हरा दिया। निसार हुसैन को 32 हजार 609 वोटों के साथ संतोष करना पड़ा। वहीं, जनता दल के अब्दुल गफूर तीसरे नंबर पर रहे और वह 26 हजार 356 वोट ही हासिल कर पाए। 1989 के बाद शिव बहादुर सक्सेना ने स्वार टांडा में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की।
स्वार की जनता ने शिव बहादुर सक्सेना को लगातार तीसरी बार चुना विधायक
1993 में शिव बहादुर ने लगातार तीसरी जीत दर्ज की। इस बार भी मुकाबला शिव बहादुर सक्सेना, निसार हुसैन और अब्दुल गफूर के बीच में था। इस चुनाव में बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना ने 50 हजार 845 वोट, जनता दल के अब्दुल गफूर ने 38 हजार 140 और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निसार हुसैन ने 26 हजार 766 वोट हासिल किए। आखिर में जीत 12 हजार 705 वोटों के अंतर से शिव बहादुर सक्सेना की हुई। इस चुनाव में कांग्रेस ने निसार हुसैन की जगह जाहिद अली को टिकट दिया था, जो चौथे नंबर पर रहे थे और महज 23 हजार 597 वोटों पर सिमट गए थे।
1996 में शिव बहादुर सक्सेना ने लगाया जीत का चौका
1996 में भी स्वार टांडा सीट पर कब्जा बीजेपी का ही रहा। इस चुनाव में बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना के सामने थे समाजवादी पार्टी के अब्दुल गफूर और BSP के राधेश्याम आर्य। निसार हुसैन ने भी यह चुनाव लड़ा था और किसान विकास पार्टी के टिकट पर सियासी मैदान में थे। इस चुनाव में शिव बहादुर सक्सेना ने लगातार चौथी बार स्वार टांडा सीट पर जीत दर्ज करते हुए 59 हजार 477 वोट हासिल किए और 7 हजार 493 वोटों के अंतर से अब्दुल गफूर को हरा दिया था। अब्दुल गफूर 51 हजार 984 वोट ही हासिल कर पाए थे। 1990 के बाद स्वार टांडा में सबसे कम अंतर से जीत-हार इसी चुनाव में हुई थी। BSP और KVP, 1996 के चुनाव में तीसरे और चौथे नंबर पर रहे थे। बीएसपी के राधेश्याम आर्य को 41 हजार 511 और KVP के निसार हुसैन को 31 हजार 618 वोट मिले थे।
2002 से शुरू हुआ नवाब काजिम अली खान का दबदबा
हालांकि, 2002 के विधानसभा चुनाव में स्वार टांडा की सियासत में बड़ा बदलाव आया। कांग्रेस के नवाब काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां ने यह चुनाव बड़े अंतर से जीत लिया और बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना के विजय रथ को रोक दिया। इस चुनाव में नवाब काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां ने 83 हजार 135 वोट पाकर शिव बहादुर सक्सेना को 27 हजार 10 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया। शिव बहादुर सक्सेना इस चुनाव में 56 हजार 125 वोट ही हासिल कर पाए थे। 2002 के चुनाव में BSP की तरफ से यूसुफ अली भी सियासी मैदान में थे, जिन्हें 38 हजार 938 वोटों के साथ संतोष करना पड़ा था।
| वर्ष | विजेता | पार्टी | वोट | रनर-अप | पार्टी | वोट | अंतर |
| 1991 | शिव बहादुर सक्सेना | BJP | 44,138 | निसार हुसैन | INC | 32,609 | 11,529 |
| 1993 | शिव बहादुर सक्सेना | BJP | 50,845 | अब्दुल गफूर | JD | 38,140 | 12,705 |
| 1996 | शिव बहादुर सक्सेना | BJP | 59,477 | अब्दुल गफूर | SP | 51,984 | 7,493 |
| 2002 | नवाब काजिम अली खान | INC | 83,135 | शिव बहादुर सक्सेना | BJP | 56,125 | 27,010 |
| 2007 | नवाब काजिम अली खान | SP | 61,227 | शिव बहादुर सक्सेना | BJP | 46,621 | 14,606 |
| 2012 | नवाब काजिम अली खान | INC | 55,469 | लक्ष्मी सैनी | BJP | 41,754 | 13,715 |
| 2017 | अब्दुल्ला आजम खान | SP | 1,06,443 | लक्ष्मी सैनी | BJP | 53,347 | 53,096 |
| 2022 | अब्दुल्ला आजम खान | SP | 1,26,162 | हैदर अली खान | AD(S) | 65,059 | 61,103 |
| 2023 (उपचुनाव) | शफीक अहमद अंसारी | अपना दल (सोनेलाल) | 68,630 | अनुराधा चौहान | SP | 59,906 | 8,724 |
(सोर्स- Election Commission Of India)
पार्टी बदली लेकिन नतीजा नवाब काजिम अली खान के पक्ष में ही रहा
2007 का चुनाव आते-आते सियासत का रुख बदला। नवाब काजिम अली खान ने पार्टी बदलकर इस बार समाजवादी पार्टी के कैंडिडेट के तौर पर चुनाव लड़ा लेकिन नतीजा 2002 वाला ही रहा। नवाब काजिम अली खान ने बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना को 14 हजार 606 वोटों के अंतर से हरा दिया। नवाब काजिम अली खान ने 61 हजार 227 वोट हासिल किए, जबकि शिव बहादुर सक्सेना 46 हजार 621 वोटों पर ही थम गए। 2007 में यूसुफ अली फिर से BSP के टिकट पर चुनाव लड़े थे और फिर से तीसरे नंबर पर ही रहे। यूसुफ अली को इस बार स्वार टांडा की जनता ने 43 हजार 857 वोट दिए।
2008 में परिसीमन के बाद काजिम अली ने लगाई जीत की हैट्रिक
2008 के परिसीमन के बाद Suar Tanda का नाम Suar हो गया और विधानसभा की संख्या 20 की जगह 34 हो गई। नए परिसीमन में स्वार में स्वार और टांडा कानूनगो सर्किल, दोनों के नगर निकाय और मसवासी क्षेत्र को इसमें शामिल कर लिया गया। 2012 के चुनाव में नवाब काजिम अली खान ने जीत की हैट्रिक लगा दी और इस बार वह कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में स्वार के सियासी मैदान में थे। नवाब काजिम अली खान ने 55 हजार 469 वोट पाकर बीजेपी प्रत्याशी लक्ष्मी सैनी को 13 हजार 715 वोटों के अंतर से हरा दिया। लक्ष्मी सैनी इस चुनाव में 41 हजार 754 वोट ही हासिल कर पाईं। इस चुनाव में अब्दुल गफूर भी सपा के टिकट पर मैदान में थे और उन्हें तीसरे स्थान पर 37 हजार 828 वोटों के साथ सब्र करना पड़ा। BSP ने स्वार में अब्दुल अजीम खान को मौका दिया था जो 24 हजार 932 वोटों पर सिमट गए थे।
2017 में स्वार सीट से हुई आजम खान के बेटे की लॉन्चिंग
2017 के स्वार के विधानसभा चुनाव में इस पर समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान के बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खान की एंट्री होती है। सपा प्रत्याशी का मुकाबला फिर से बीजेपी की लक्ष्मी सैनी से था। अब्दुल्ला आजम खान ने 53 हजार 96 वोटों के बड़े अंतर से उन्हें हरा दिया। ECI के आंकड़ों के अनुसार, 2017 के चुनाव में अब्दुल्ला आजम खान ने 1 लाख 6 हजार 443 वोट हासिल किए, जबकि लक्ष्मी सैनी की पारी 53 हजार 347 वोटों पर सिमट गई। इस चुनाव में नवाब काजिम अली, BSP के टिकट पर मैदान में थे और उन्हें 42 हजार 233 वोटों के साथ ही संतोष करना पड़ा। हालांकि, बाद में अब्दुल्ला आजम खान, कानूनी पचड़ों में फंस गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिसंबर 2019 में पाया कि 2017 में नॉमिनेशन के समय अब्दुल्ला आजम की उम्र 25 साल से कम थी, जो MLA का चुनाव लड़ने के लिए जरूरी होती है। इसीलिए हाईकोर्ट ने स्वार का 2017 का चुनाव शून्य घोषित कर दिया था।
2022 में लगातार दूसरी बार विधायक बने अब्दुल्ला आजम खान
समाजवादी पार्टी ने 2022 में अब्दुल्ला आजम को एक बार फिर स्वार में उम्मीदवार बनाया और इस बार अब्दुल्ला ने स्वार के इतिहास की सबसे बड़े अंतर की जीत दर्ज की। अब्दुल्ला को 1 लाख 26 हजार 162 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी के गठबंधन की साथी अपना दल (सोनेलाल) की पार्टी के हैदर अली खान को 61 हजार 103 वोटों के अंतर से हरा दिया। हैदर अली, 65 हजार 59 वोट ही हासिल कर पाए। BSP की हालत इस चुनाव में और भी खराब हो गई। स्वार में BSP के प्रत्याशी अध्यापक शंकरलाल को 14 हजार 963 वोट ही मिल पाए।
2023 उपचुनाव में अपना दल ने पहली बार जीता स्वार
दूसरी बार विधायक बनने के बाद भी अब्दुल्ला आजम की विधायकी पूरे 5 साल नहीं चल पाई। अब्दुल्ला आजम को 2023 में एक क्रिमिनल केस में सजा हो गई और इसके चलते उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई। फिर स्वार सीट खाली होने की वजह से 2023 में उपचुनाव हुआ और बीजेपी ने फिर से 2022 वाली स्ट्रैटेजी पर काम किया। बीजेपी ने गठबंधन की साथी अपना दल (सोनेलाल) की पार्टी के प्रत्याशी के रूप में शफीक अहमद अंसारी को उतारा और उन्होंने 8 हजार 724 वोटों के अंतर से अनुराधा चौहान को हरा दिया। शफीक अहमद अंसारी ने 68 हजार 630 वोट हासिल किए, जबकि समाजवादी पार्टी की अनुराधा चौहान को 59 हजार 906 वोट ही मिल पाए। ये मुकाबला पूरी तरह से दोतरफा था क्योंकि तीसरे नंबर पर रहीं पीस पार्टी की डॉक्टर नाजिया सिद्दीकी को सिर्फ 4 हजार 688 वोट ही मिले थे।
विधानसभा चुनाव 2027 के लिए स्वार का सियासी समीकरण
स्वार के सामाजिक समीकरण की बात करें तो इसकी गिनती मुस्लिम बहुल सीटों में होती है। इसके अलावा, यहां अन्य ओबीसी समूह जैसे- सैनी, लोधी, पाल, कश्यप, प्रजापति और वैश्य व SC वर्ग के मतदाता भी निर्णायक संख्या में हैं। अगर हम सिर्फ पिछले तीन दशक ही देखें तो 1991 से 2023 तक हुए आम चुनाव और उपचुनाव के परिणामों को देखें तो बीजेपी और बीजेपी गठबंधन ने 4 बार और सपा ने तीन और कांग्रेस ने दो बार चुनाव जीते हैं। उम्मीदवार के तौर पर बात करें तो शिव बहादुर सक्सेना और नवाब काजिम अली खान ने तीन-तीन चुनावों में जीत हासिल की। स्वार की सियासी कहानी में 90 के दौर में बीजेपी का दबदबा दिखता है तो बीच में लंबे दौर तक नवाब काजिम अली अली खान स्वार सीट काबिज हो जाते हैं। बाद में अब्दुल्ला आजम खान की दो बार लगातार जीत के बाद अब ये सीट अपना दल (सोनेलाल) के पास है।
2027 का सियासी समीकरण देखें तो बीजेपी और अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (सोनेलाल) का अभी भी गठबंधन है। माना जा रहा है कि रणनीति के तहत स्वार सीट से फिर से NDA गठबंधन अपना दल (सोनेलाल) का प्रत्याशी उतार सकता है। वहीं, दूसरे पाले में उसको चुनौती देते हुए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन का उम्मीदवार दिख सकता है। BSP भी स्वार में दम भरेगी लेकिन वह एक बार भी अभी तक स्वार सीट जीतना तो छोड़िए रनरअप भी नहीं रह पाई है। ऐसे में विधानसभा चुनाव 2027 में स्वार सीट पर NDA और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।
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