1. Hindi News
  2. वायरल न्‍यूज
  3. कभी सोचा है, रेलवे प्लेटफॉर्म की टिकट के किनारे छेद क्यों बने होते हैं, बेहद दिलचस्प है जवाब

कभी सोचा है, रेलवे प्लेटफॉर्म की टिकट के किनारे छेद क्यों बने होते हैं, बेहद दिलचस्प है जवाब

 Written By: Shaswat Gupta
 Published : Jun 05, 2026 07:25 am IST,  Updated : Jun 05, 2026 07:25 am IST

Railway Interesting Facts : सोशल मीडिया पर आपने रेलवे से जुड़े कई तरह के फैक्ट पढ़े होंगे। मगर, क्या आपने कभी सोचा है कि रेलवे प्लेटफॉर्म की टिकट के किनारे छेद क्यों बने होते हैं ?

Indian Railway Facts, Interesting Facts, Why Platform Ticket Has Holes, Viral News, Railway Facts, R- India TV Hindi
रेलवे प्लेटफॉर्म की टिकट। Image Source : FB/@JOHN B-NAGERCOIL

Railway Interesting Facts : आपने भारतीय रेलवे के प्लेटफॉर्म टिकट खरीदते समय देखा होगा कि उनके दोनों किनारों पर बनी एक सीधी लाइन में छोटी-छोटी गोल छेद बने होते हैं। क्या आप जानते हैं कि, इनको किस उद्देश्य से बनाया जाता है? कई लोग इन्हें सिर्फ डिजाइन या सजावट समझते हैं, लेकिन इनका पीछे एक बेहद तकनीकी और व्यावहारिक कारण छिपा है। जिसके बारे में आज हम आपको बताने वाले हैं।

प्लेटफॉर्म टिकट में बने छेद 

बता दें कि, प्लेटफॉर्म टिकट में बने छेद स्प्रॉकेट होल्स (Sprocket Holes) कहलाते हैं और डॉट-मैट्रिक्स प्रिंटर की पुरानी प्रणाली से जुड़े हैं। 1980-90 के दशक से लेकर 2000 के शुरुआती वर्षों तक भारतीय रेलवे में टिकट छपाई के लिए डॉट-मैट्रिक्स प्रिंटर का व्यापक इस्तेमाल होता था। ये प्रिंटर आज के थर्मल या लेजर प्रिंटर से अलग थे। इनमें साधारण अलग-अलग शीट नहीं, बल्कि कंटीन्यूअस फीड पेपर (लंबी लगातार कागज की पट्टी) इस्तेमाल होता था। इस पेपर के दोनों किनारों पर ठीक-ठीक दूरी पर छोटे गोल छेद बनाए जाते थे। प्रिंटर के अंदर दांतदार पहिए इन छेदों में फंसकर कागज को बिल्कुल सटीक और एकसमान गति से आगे बढ़ाते थे।  

टिकट में छेद क्यों बनाए जाते हैं 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिना इन छेदों के कागज फिसल सकता था जिससे टिकट पर छपने वाली जानकारी-स्टेशन का नाम, ट्रेन नंबर, किराया, तारीख, समय-टेढ़ी-मेढ़ी या गलत जगह छप जाती। व्यस्त स्टेशनों पर जहां हर दिन हजारों टिकट छपते थे, यह सिस्टम गति और सटीकता दोनों सुनिश्चित करता था। प्रिंटिंग के बाद छेद वाली किनारी पट्टियों को फाड़कर अलग कर दिया जाता था, जिससे टिकट के किनारे थोड़े खुरदुरे दिखते थे। यह तकनीक सिर्फ रेलवे तक सीमित नहीं थी। 1980-2000 के दशक में कंप्यूटर प्रिंटिंग की दुनिया में डॉट-मैट्रिक्स और स्प्रॉकेट होल्स स्टैंडर्ड थे, खासकर इनवॉइस, रसीद और निरंतर फॉर्म्स के लिए। भारतीय रेलवे ने भी कंप्यूटरीकृत आरक्षण शुरू होने के बाद (1986 के आसपास) इस सिस्टम को अपनाया। इससे पहले मैनुअल तरीके से टिकट जारी होते थे।

 

पुराने टिकट नॉस्टैल्जिया का प्रतीक

गौरतलब है कि, ये स्पेशल पेपर और छेदों का पैटर्न बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं था, जिससे नकली टिकट बनाना मुश्किल होता था।समय के साथ तकनीक बदली। थर्मल प्रिंटर, ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) और ई-टिकटिंग (IRCTC, UTS ऐप) के आने से कंटीन्यूअस पेपर की जरूरत खत्म हो गई। अब ज्यादातर टिकट बिना छेद वाले आते हैं। प्लेटफॉर्म टिकट भी अब डिजिटल या सरल पेपर फॉर्म में उपलब्ध हैं, जिनकी वैधता आमतौर पर 2 घंटे होती है। पुराने टिकट आज नॉस्टैल्जिया का प्रतीक बन चुके हैं। वे भारतीय रेलवे के तकनीकी विकास की कहानी बताते हैं—मैनुअल से कंप्यूटराइज्ड, फिर डिजिटल युग तक। अगली बार कोई प्लेटफॉर्म हाथ लगे तो याद रखें, ये छोटे-छोटे छेद रेलवे की पूरी टिकटिंग व्यवस्था की रीढ़ थे।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

ये भी पढ़ें -
किस देश में चुनाव वाले दिन ही रिजल्ट आ जाता है, एक तो भारत का ही पड़ोसी; क्या आप जानते हैं नाम

अरब देशों को 'खाड़ी देश' क्यों कहते हैं, 99% लोगों को नहीं पता जवाब; क्या आपको मालूम है 
 

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। वायरल न्‍यूज से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।