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सैन्यवाद जापानियों के लिए सिद्ध हुआ था घातक

 Written By: India TV News Desk
 Published : Aug 09, 2015 07:34 pm IST,  Updated : Aug 09, 2015 07:36 pm IST

बीजिंग: सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटे हुए देशों को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान में परमाणु बम से हुई बर्बादी से यह सीखने की ज़रूरत है कि सैन्यवादी जुनून बेहद घातक सिद्ध हो सकता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध में सभी जापानियों ने झेलीं मुसीबतें

हिरोशिमा-नागासाकी के पीड़ितों के साथ पूरी सहानुभूति रखते हुए कहा जा सकता है कि सिर्फ इन्हीं दो शहरों के लोग नहीं हैं जिन्हें जापान की तरफ से छेड़े गए युद्ध में मुसीबतें झेलनी पड़ीं।

जापानी सेनाओं के हमले में चीन और अन्य एशियाई देशों के लाखों लोग मारे गए। शहरों और गांवों को लूट लिया गया। जापान ने ऐसा महज अपने सैन्यवादी जुनून और महत्वाकांक्षाओं की वजह से किया।

हिरोशिमा-नागासाकी के लोगों को श्रद्धांजलि देने के साथ जापानी नेताओं और लोगों को अपने युद्ध अपराधियों की करतूत की भी भर्त्सना करनी चाहिए। उन जुनूनी विचारों की परख करनी चाहिए दो ऐसे त्रासदियों को जन्म देते हैं।

जापानी सैन्यवादियों की सनक वह वजह थी जिसने इन दोनों शहरों को मिटा दिया। हार सिर पर थी लेकिन फिर भी इन्होंने 1945 के पोट्सडैम समझौते पर सहमति नहीं जताई। सिर्फ इस वजह से कि इनकी सोच में नागरिकों की मौत की कोई कीमत नहीं थी। वह अपनी महत्वाकांक्षा के पीछे पागल थे।

हिरोशिमा-नागासाकी और अन्य जगहों पर जापानी सैनिकों की तरफ से की गई बरबादी से सिर्फ यही पता चलता है कि जुनूनी सैन्यवाद क्या कर सकता है। जापानी सैन्यवाद दूसरों के साथ-साथ खुद जापान के लोगों के लिए घातक था।

युद्ध विधेयक वापस लो' के नारे लगे

इसीलिए, अबे सरकार की सैन्यवादी रुझान की तरफ बढ़ने की प्रवृत्ति, नए सुरक्षा कानूनों पर बल देना, देश के युद्धकालीन अतीत पर पर्दा डालना जैसी बातें परेशान करने वाली हैं। बहुत से जापानी भी इसे पसंद नहीं करते। इसीलिए हिरोशिमा और नागासाकी में अबे के भाषण के दौरान प्रदर्शनकारियों ने 'युद्ध विधेयक वापस लो' के नारे लगाए।

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