बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने सोमवार को इस्तीफा देकर देश छोड़कर भागने वाली प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सज़ा सुनाई है। कोर्ट ने सजा सुनाने को लेकर अपनी पूरी ताकत झोंक दी। बता दें की शेख हसीना ने ही साल 2009 में, आईसीटी की स्थापना की थी, इसके 36 साल बाद उसी कोर्ट ने मानवता विरोधी अपराध का कसूरवार का दोषी मानते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई है। ऐसे में यह वैसा ही है जैसी भस्मासुर की पौराणिक कथा है जिसमें जिस भगवान शंकर ने भस्मासुर को शक्तियां दीं, वही उन्हें खत्म करने के लिए उनका पीछा करने लगा था बांग्लादेश में भी ऐसा ही हुआ है।
शेख हसीना ने ही आईटीसी की स्थापना की थी
बांग्लादेश के आईसीटी की स्थापना खुद शेख हसीना ने 2009 में की थी, उसी साल वह देश की प्रधानमंत्री बनीं थीं। तब से लेकर 2024 तक वे प्रधानमंत्री के पद पर रहीं, देश में 2024 में आरक्षण को मुद्दे को लेकर छात्रों का आंदोलन हुआ जो हिंसा में बदल गया और सत्ता परिवर्तन तक चला। अगस्त में उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया गया। इस आंदोलन ने तूल पकड़ा और शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़कर भागना पड़ा। तब से लेकर अबतक शेख हसीना भारत में रह रही हैं।
बांग्लादेश में आखिरी बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव साल 2008 में हुए थे। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय अपराध (न्यायाधिकरण) अधिनियम, 1973 को पुनर्जीवित करने के बाद, एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित शेख हसीना की सरकार ने आईसीटी की स्थापना की थी।

क्यों की गई आईसीटी की स्थापना ?
आईसीटी (ICT) की स्थापना का मुख्य उद्देश्य 1971 के मुक्तियुद्ध या बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वालों और पाकिस्तान की मदद करने वालों को सजा देना था। उस मुक्तियुद्ध में स्थानीय सहयोगियों और मिलिशिया, रजाकारों, अल-बद्र और अल-शम्स ने नौ महीने तक चले नरसंहार और लाखों बंगाली महिलाओं और लड़कियों के बलात्कार में पाकिस्तानी सेना की मदद की थी। इसीलिए आईसीटी की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य उन नरसंहार के अपराधियों को दंडित करने के लिए एक न्यायाधिकरण बनाना था। हसीना द्वारा स्थापित आईसीटी ने 1971 के युद्ध अपराधों पर अपनी कार्यवाही शुरू की थी और सजा सुनाई गई थी।
पांच लोगों को कानूनी प्रक्रिया के तहत दी गई फांसी
बांग्लादेश के बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार, 21 जनवरी, 2013 को आईसीटी ने अपना पहला फ़ैसला सुनाया था और सबसे पहले अबुल कलाम आज़ाद, जिन्हें बच्चू राजाकर के नाम से भी जाना जाता है, को उनकी अनुपस्थिति में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। आईसीटी ने पिछले 15 वर्षों में 57 फ़ैसले सुनाए, जिनमें से पांच लोगों को सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद फांसी दी गई।
फांसी पाने वाला पहला व्यक्ति जमात नेता अब्दुल कादर मोल्ला था, जिसे अभियोजकों ने 350 निहत्थे नागरिकों की हत्या के लिए मीरपुर का कसाई कहा था। मोल्ला को दिसंबर 2013 में ढाका में फांसी दी गई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा को चुनौती देने वाली उनकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी। आईसीटी के फैसले के बाद सबसे हालिया फांसी मई 2016 में बांग्लादेश के पूर्व मंत्री और जमात प्रमुख मोतीउर रहमान निज़ामी को दी गई थी। उन्हें नरसंहार, बलात्कार और यातना का दोषी ठहराया गया था।

किस किस को दी गई थी फांसी
मोतीउर रहमान निज़ामी युद्ध अपराध न्यायाधिकरण के फ़ैसले के बाद फांसी की सज़ा पाने वाले सबसे वरिष्ठ और चौथे जमात नेता थे। इस सूची में बीएनपी नेता सलाउद्दीन क़ादिर चौधरी भी शामिल हैं, जिन्हें नवंबर 2015 में फांसी दी गई थी। चौधरी बीएनपी के एक उच्च पदस्थ नेता थे, जिन्होंने 2001 से 2006 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया के संसदीय मामलों के मंत्री और सलाहकार के रूप में कार्य किया था।
सलाउद्दीन क़ादिर चौधरी चटगांव से छह बार बांग्लादेश की संसद के लिए चुने गए थे, को आईसीटी ने 1971 में 200 लोगों की हत्या का आदेश देने के लिए दोषी ठहराया था। बीएनपी और उनके परिवार के सदस्यों ने इस मुक़दमे को "तमाशा" बताया। जब उन्हें सज़ा सुनाई जा रही थी, तब चौधरी ने ख़ुद आरोप लगाया था कि न्यायाधिकरण का फ़ैसला "क़ानून मंत्रालय" से आया था, और यह फ़ैसला सुनाए जाने से पहले ही इंटरनेट पर उपलब्ध था। बांग्लादेश में इन नेताओं की फांसी का जश्न तो मनाया गया, लेकिन लोगों के एक वर्ग ने इस तरह के फैसले का विरोध भी किया गया।
युनूस के हाथ में आ गई आईसीटी
आईसीटी, जिसकी स्थापना 1971 के युद्ध अपराधों की सुनवाई के लिए की गई थी, ने बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद एक बिल्कुल अलग कार्यभार संभाल लिया था। छात्र आंदोलन, ने 5 अगस्त, 2024 को शेख हसीना को सत्ता से बेदखल कर दिया। इसके बाद, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने आईसीटी को जुलाई-अगस्त आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों की हत्याओं के लिए अवामी लीग के नेताओं और हसीना सरकार के अधिकारियों पर मुकदमा चलाने का काम सौंपा।
हसीना और उनके सहयोगियों पर आधिकारिक तौर पर बताए गए 1,400 प्रदर्शनकारियों से संबंधित मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है। हसीना और उनके पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को 17 नवंबर को आईसीटी ने मौत की सजा सुनाई थी। यूनुस शासन के आईसीटी और हसीना शासन के आईसीटी के बीच अंतर करने की कोशिश की गई।

जिसने बनाया कोर्ट, उसे ही सुनाई गई सजा
जुलाई आंदोलन के नेता और अब नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख नाहिद इस्लाम ने यूनुस शासन से हसीना को भारत से वापस लाने की मांग की, जहां वह स्व-निर्वासन पर हैं। नाहिद ने कहा, "जब तक सज़ा पर अमल नहीं हो जाता, हमें संतुष्टि नहीं मिलेगी।"
अपनी प्रतिक्रिया में, हसीना ने आईसीटी के फैसले को "पक्षपातपूर्ण, राजनीति से प्रेरित" और "बिना किसी लोकतांत्रिक जनादेश वाले धांधली भरे न्यायाधिकरण" द्वारा जारी किया गया फैसला बताया है। इसलिए, 1971 के युद्ध के अपराधियों पर मुकदमा चलाने के लिए शेख हसीना द्वारा स्थापित आईसीटी ने अपना जनादेश बदल दिया और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए इसके निर्माता को ही मौत की सज़ा सुना दी।