नई दिल्ली: मशहूर गीतकार नौशाद ने मोहम्मद रफी के निधन पर लिखा था, 'गूंजती है तेरी आवाज अमीरों के महल में, झोपड़ों के गरीबों में भी है तेरे साज, यूं तो अपने मौसिकी पर साहब को फक्र होता है मगर ए मेरे साथी मौसिकी को भी आज तुझ पर है नाज'। मोहम्मद रफी को दुनिया अलविदा कहे हुए आज 35 वर्ष हो चुके है। उनके सदाबहार गीतों की वजह से लोग उन्हें आज भी याद करते हैं। दुनिया भर में उनके लाखों-करोड़ों फैंस है। लेकिन उनके बारें में कम ही लोग इस बात को जानते होंगे कि रफी साहब पहले लाहौर में अपने पिता का सैलून संभाला करते थे। दरअसल 1935 में मोहम्मद रफी के वालिद लाहौर गए थे जहां उन्होंने एक सैलून खोला। उस समय रफी साहब भी उस सैलून पर काम करने लगे थे और तब उनकी उम्र मात्र 11 वर्ष थी। एक दिन उनके सैलून में लाहौर रेडियो स्‍टेशन के डायरेक्‍टर शेविंग करवाने आए। उन्होंने वहां एक फिको नाम के बच्चे को गाना गुनगुनाते हुए सुना जो उन्हें बहुत मीठा लगा। इसके बाद उन्होंने उस बच्चे को गाना गाने का मौका दिया जो आज मोहम्मद रफी के नाम से मशहूर है। पेश हैं उनके सदाबहार नगमें- फिल्म: जंगली वर्ष: 1961 डायरेक्टर: सुबोध मुखर्जी अगली स्लाइड में देखें सुरों के शहंशाह रफी साहब के बेहतरीन गाने:- फिल्म: असली नकली वर्ष: 1962 डायरेक्टर: ऋषिकेश मुखर्जी फिल्म: काला पानी वर्ष: 1958 डायरेक्टर: राज खोसला फिल्म: दो रास्ते वर्ष: 1969 डायरेक्टर: राज खोसला फिल्म: चिराग वर्ष: 1969 डायरेक्टर: राज खोसला फिल्म: प्रिंस वर्ष: 1969 डायरेक्टर: लेख टनडन फिल्म: दो कलियां वर्ष: 1968 डायरेक्टर: कृष्णा पंजू फिल्म: हम किसी से कम नहीं वर्ष: 1977 डायरेक्टर: नासिर हुसैन फिल्म: गाइड वर्ष: 1965 डायरेक्टर: विजय आनंद फिल्म: तेरे घर के सामने वर्ष: 1963 डायरेक्टर: विजय आनंद फिल्म: नीलकमल वर्ष: 1968 डायरेक्टर: राम महेश्वरी