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क्या गैंगरेप में महिला भी हो सकती है आरोपी? दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से समझिए पूरा मामला

 Written By: Vineet Kumar Singh
 Published : Oct 15, 2026 08:06 pm IST,  Updated : Oct 15, 2026 08:06 pm IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि साझा मंशा से गैंगरेप कराने में भूमिका निभाने वाली महिला को भी आरोपी बनाया जा सकता है। हालांकि, महिला अकेले गैंगरेप के आरोप का सामना नहीं कर सकती। मामला नाबालिग के यौन शोषण से जुड़ा है।

Delhi High Court Gang Rape Ruling, Woman Accused in Gang Rape Case- India TV Hindi
दिल्ली हाईकोर्ट ने गैंगरेप के एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। Image Source : ANI

Highlights

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, साझा मंशा से रेप कराने वाली महिला पर गैंगरेप का आरोप लग सकता है।
  • अदालत के मुताबिक, गैंगरेप के लिए खुद शारीरिक हमला करना हर आरोपी के लिए जरूरी नहीं।
  • नाबालिग बेटी के यौन शोषण मामले में मां की याचिका खारिज, आरोप तय करने का आदेश बरकरार।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गैंगरेप के मामले में किसी महिला को भी आरोपी बनाया जा सकता है, अगर उसने किसी महिला के साथ रेप कराने की साझा मंशा से काम किया हो। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि उसने खुद यौन हमला किया हो। अदालत ने कहा कि कानून में इस्तेमाल किए गए ‘व्यक्तियों’ शब्द का मतलब सिर्फ पुरुषों का समूह नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई महिला अकेले गैंगरेप के आरोप का सामना नहीं कर सकती।

महिला पर गैंगरेप का आरोप लगाने का क्या है आधार?

जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने 15 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। अदालत एक महिला और एक अन्य आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने दलील दी थी कि कानून में रेप करने वाले की परिभाषा पुरुष से जुड़ी है, इसलिए उसे गैंगरेप के मामले में आरोपी नहीं बनाया जा सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376D और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 70 के तहत गैंगरेप एक अलग अपराध है। इसकी व्याख्या संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर की जानी चाहिए।

‘व्यक्तियों’ शब्द का मतलब सिर्फ पुरुषों का समूह नहीं

अदालत ने अपने फैसले में कहा,

"कानून में ‘एक समूह बनाने वाले एक या अधिक व्यक्ति’ शब्दों को सिर्फ पुरुषों के समूह तक सीमित रखने का कोई तर्क या आधार नहीं है।"

कोर्ट ने समझाया कि गैंगरेप के अपराध में किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसने खुद यौन हमला किया था या नहीं। अगर वह पीड़िता के साथ रेप कराने की साझा मंशा से काम करता है, तो उस पर भी गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है।

क्या महिला अकेले गैंगरेप की आरोपी बन सकती है?

हाईकोर्ट ने इस फैसले की सीमा भी स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि वह इस सवाल पर कोई राय नहीं दे रही है कि कानून में रेप की परिभाषा के तहत कोई महिला खुद रेप कर सकती है या नहीं। अदालत के सामने केवल यह सवाल था कि क्या किसी महिला पर गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला को अकेले गैंगरेप का आरोपी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि प्रथम दृष्टया ऐसा आरोप कानून में रेप की मौजूदा परिभाषा के अनुरूप नहीं होगा। लेकिन अगर वह किसी समूह के साथ मिलकर या साझा मंशा के तहत रेप कराने में भूमिका निभाती है, तो उसके खिलाफ गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है।

नाबालिग लड़की के यौन शोषण से जुड़ा है मामला

यह मामला एक नाबालिग लड़की के आरोपों से जुड़ा है। आरोप है कि दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच उसकी मां ने उसे धमकाया और एक अन्य आरोपी के साथ कई बार यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि यौन हमले की घटनाओं के दौरान उसकी मां कमरे में मौजूद रहती थी। मां ने अदालत में आरोप तय करने के आदेश को चुनौती दी थी। उसकी दलील थी कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में रेप करने वाले के रूप में पुरुष का जिक्र है, इसलिए किसी महिला पर गैंगरेप का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

2013 के कानून संशोधन का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने कहा कि साल 2013 में IPC में किए गए संशोधन के बाद रेप की परिभाषा को व्यापक बनाया गया था। इसके साथ ही धारा 376D जोड़ी गई, जिसके तहत गैंगरेप को एक अलग अपराध बनाया गया। अब भारतीय न्याय संहिता में इसका संबंधित प्रावधान धारा 70 के तहत है। अदालत ने कहा कि कानून में उन व्यक्तियों का भी जिक्र है, जो साझा मंशा को आगे बढ़ाते हुए अपराध में भूमिका निभाते हैं। इसमें यह शर्त नहीं रखी गई है कि ऐसे सभी व्यक्ति पुरुष ही होने चाहिए।

शारीरिक हमला करना ही जरूरी नहीं

कोर्ट ने कानून में इस्तेमाल किए गए ‘या’ शब्द को भी महत्वपूर्ण बताया। अदालत के मुताबिक, साझा मंशा के तहत काम करने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि उन लोगों में शामिल हो, जिन्होंने खुद पीड़िता के साथ रेप किया हो। अदालत ने कहा,

'गैंगरेप के अपराध के लिए यह जरूरी नहीं है कि साझा मंशा को आगे बढ़ाने वाला व्यक्ति उन लोगों में भी शामिल हो, जिन्होंने शारीरिक रूप से रेप किया है।'

कोर्ट ने आगे समझाया कि कानून में ‘अपराध किया हुआ माना जाएगा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसका अर्थ है कि अपराध में समूह बनाने या साझा मंशा को आगे बढ़ाने वाले हर व्यक्ति का खुद शारीरिक रूप से अपराध करना जरूरी नहीं है। कानून के तहत साझा मंशा रखने वाले व्यक्ति को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों पर क्या कहा?

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों प्रिया पटेल बनाम मध्य प्रदेश राज्य और राजस्थान राज्य बनाम हेमराज का हवाला दिया था। इन फैसलों के आधार पर दलील दी गई कि महिला पर गैंगरेप का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले 2013 के संशोधन से पहले के कानूनी प्रावधानों से जुड़े थे। उस समय गैंगरेप को IPC की धारा 376(2)(g) के तहत रेप का गंभीर रूप माना जाता था। बाद में संशोधन के जरिए धारा 376D के तहत गैंगरेप को अलग अपराध बना दिया गया। इसलिए पुराने फैसलों को मौजूदा कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में देखना जरूरी है।

महिला के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश बरकरार

हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसले सुंदरी गौतम बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार का भी जिक्र किया। उस मामले में अदालत ने कहा था कि बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) कानून के तहत प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध करने वाले व्यक्ति का लिंग निर्णायक नहीं है। इसे आधार मानते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 जनवरी 2025 को निचली अदालत की ओर से आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा। आरोपियों के खिलाफ BNS की धारा 70(2), 351(3) और 64(2)(m) के साथ पॉक्सो कानून की धारा 6 के तहत आरोप तय किए गए थे। अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। (ANI से इनपुट्स के साथ)

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