नई दिल्ली: बॉलीवुड संगीत और गीतों की दुनिया में अपने बेहतरीन गायन के लिए ख्यात मुबारक बेगम का मुंबई में मंगलवार को निधन हो गया। 80 साल की उम्र में उन्होंने जिस अकेलेपन को जिया उससे उनकी ही फिल्म का एक गीत बरबस ही याद आता है ‘कभी तन्हाईयों में यू हमारी याद आएगी..’।
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जी हां अपने दौर की इस ख्यात गायिका के अंतिम दिन दर्द भरे रहे और जीवन के अंतिम दशक में अकेलेपन के दौर और दर्द को देखने के साथ ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। एक दूसरे के सुख-दु:ख में काम आने वाला बॉलीवुड मुबारक बेगम का उस तरह साथ नहीं दे पाया जितना दिया जाना चाहिए था।
शोहरत की बुलंदी देखने वाले सितारे का इस तरह से गुमनामी में खो जाना और चुपचाप दुनिया को अलविदा कह जाना किसी पीड़ा से कम नहीं, लेकिन मुबारक बेगम को यूं भुला दिया जाना कुछ-कुछ अखरने वाली बात है। यह दु:ख उस समय और भी बढ़ जाता है जब मुबारक बेगम अपने अतिंम दिनों में बीमारियों और आर्थिक तंगी से गुजर रही थी तो उनके अच्छे दौर के साथी कलाकार भी मदद के लिए आगे नहीं आए।
कहने को तो भारत सरकार भी कलाकारों को तमाम अवार्ड और मदद की बात का दावा करती है लेकिन मुबारक बेगम के हिस्से ना तो सरकार की मदद आई और अवार्ड और सम्मान देना तो जैसे सरकार को याद ही नहीं रहा। लेकिन मुबारक बेगम के गीत उनको अमर गायिका बनाने के लिए काफी है।
‘कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी’ या ‘फिर नींद उड़ जाए तेरी ..’ ये कुछ ऐसे गीत है जो बताते हैं कि बेशक अपनों ने भुला दिया, सरकार भी मदद नहीं कर पाई लेकिन मुबारक बेगम का नाम बेहतरीन गायिकाओं शुमार किया जाएगा, और बॉलीवुड गायन के आगाज और बेहतरीन गीतों की जब भी बात की जाएगी मुबारक बेगम का नाम जरूर याद आएगा। सिनेमा के शौक ने उनको संगीत से जोड़ा था और यह बंधन बेहद मजबूत रहा।
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