भारतीय सिनेमा में हॉरर-कॉमेडी जॉनर ने हाल के वर्षों में एक नई पहचान बनाई है, लेकिन जब इसमें जॉम्बी और कॉलेज लाइफ का तड़का लगाया जाए तो कुछ बेहद दिलचस्प निकलकर आता है। गगनजीत सिंह और आलोक द्विवेदी के निर्देशन में बनी 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जॉम्बीज एक ऐसी ही फिल्म है जो जॉम्बी शैली को भारतीय परिवेश, विशेषकर एक प्रेशर-कुकर जैसे शैक्षणिक संस्थान के बीच रखकर पेश करती है। यह फिल्म न केवल डराती है, बल्कि हमारे एजुकेशन सिस्टम और हॉस्टल लाइफ की विसंगतियों पर करारा कटाक्ष भी करती है।
कहानी का ताना-बाना
फिल्म की कहानी एक काल्पनिक लेकिन बेहद प्रतिष्ठित इंडियन इंस्टीट्यूट के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां छात्र केवल डिग्री पाने के लिए नहीं, बल्कि समाज में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहानी का नायक एक औसत छात्र है, जो सेमेस्टर एग्जाम के बोझ, अधूरे असाइनमेंट और एकतरफा प्यार के बीच फंसा हुआ है। हॉस्टल की कैंटीन में होने वाली गपशप, क्लासरूम की बोरियत और प्रोफेसरों का सख्त रवैया, सब कुछ वैसा ही है जैसा किसी भी भारतीय कॉलेज में होता है।
लेकिन ट्विस्ट तब आता है जब कैंपस के पास स्थित एक गुप्त लैब में हुए एक प्रयोग के विफल होने के कारण एक रहस्यमयी वायरस फैल जाता है। देखते ही देखते, कैंपस के मेधावी छात्र और सख्त प्रोफेसर जॉम्बीज में तब्दील होने लगते हैं। जो छात्र कल तक अपनी सीजीपीए (CGPA) को लेकर चिंतित थे, अब उनके सामने अपनी जान बचाने की चुनौती है।
कहानी का दूसरा हिस्सा पूरी तरह से सर्वाइवल ड्रामा बन जाता है। मुख्य पात्रों का एक समूह हॉस्टल के एक कमरे में फंस जाता है और उनके पास हथियार के नाम पर केवल उनकी किताबें, क्रिकेट बैट और इंजीनियरिंग के जुगाड़ू औजार हैं। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे संकट की घड़ी में कॉलेज की आपसी कंपीटिशन खत्म हो जाता है और दोस्ती के नए समीकरण बनते हैं। क्या ये छात्र इस जॉम्बीज आतंक से बच पाएंगे? क्या वे अपनी बुद्धिमानी का उपयोग कर इस वायरस को फैलने से रोक पाएंगे? फिल्म का प्लॉट इन्हीं सवालों के जवाब तलाशता है, जिसमें डर और हंसी का एक अनोखा मिश्रण है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
गगनजीत सिंह और आलोक द्विवेदी ने निर्देशन की कमान बखूबी संभाली है। उन्होंने फिल्म को एक खास 'सेल्फ-अवेयर' टोन दी है, जिसका मतलब है कि फिल्म खुद को बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती, जो कि एक जॉम्बी-कॉमेडी के लिए जरूरी है। उनका विजन साफ है, वे दर्शकों को डराना तो चाहते हैं, लेकिन साथ ही वे चाहते हैं कि दर्शक किरदारों की बेबसी पर मुस्कुराएं भी।
तकनीकी रूप से फिल्म का सिनेमैटोग्राफी विभाग काबिले तारीफ है। हॉस्टल की तंग गलियों और अंधेरे कॉरिडोर को जिस तरह से शूट किया गया है, वह एक क्लॉस्ट्रोफोबिक (दमघोंटू) माहौल पैदा करता है। जॉम्बीज के मेकअप और प्रोस्थेटिक्स पर मेहनत साफ दिखाई देती है, लेकिन फिर भी वो उतने प्रभावी नहीं की डर पैदा कर सकें। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कहानी की गति के साथ तालमेल बिठाता है मगर थ्रिलर वाले हिस्सों में चूकता है।
अभिनय का जादू
फिल्म की जान इसके कलाकार हैं। जेसी लीवर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे कॉमिक टाइमिंग के उस्ताद हैं। उनके वन-लाइनर्स और जॉम्बीज को देखकर उनकी प्रतिक्रियाएं फिल्म के सबसे मज़ेदार हिस्से हैं। वे फिल्म में हल्की-फुल्की राहत प्रदान करते हैं, लेकिन गंभीर दृश्यों में भी उनका अभिनय प्रभावी है।
अनुप्रिया गोयनका ने एक सशक्त और बुद्धिमान छात्रा की भूमिका निभाई है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को एक गंभीरता प्रदान करती है। मोहन कपूर ने एक अनुभवी किरदार के रूप में कहानी में गहराई जोड़ी है। उनकी परिपक्वता फिल्म के पागलपन भरे माहौल को संतुलित करती है। सहायक कलाकारों ने भी हॉस्टल के छात्रों के रूप में अच्छा काम किया है, जिससे पूरी फिल्म काफी 'रिलेटेबल' लगती है।
कमी और कहां रह गई?
हर फिल्म की तरह इसमें भी कुछ कमियां हैं। फिल्म का पहला आधा हिस्सा किरदारों को स्थापित करने में थोड़ा ज्यादा समय लेता है, जिससे मुख्य प्लॉट शुरू होने में देरी महसूस होती है। कुछ जगहों पर ह्यूमर थोड़ा लाउड और रिपीटिटिव हो जाता है, जो शायद हर तरह के दर्शकों को पसंद न आए।
इसके अलावा फिल्म का स्क्रीनप्ले दूसरे भाग में थोड़ा डगमगाता है। कुछ लॉजिक संबंधी कमियां भी नजर आती हैं, जैसे जॉम्बीज के हमले के बीच भी कुछ किरदारों का बेहद शांत रहना। क्लाइमेक्स को और अधिक रोमांचक बनाया जा सकता था, ऐसा लगता है कि फिल्म को खत्म करने की थोड़ी जल्दबाजी की गई है। विज्ञान और वायरस के पीछे के कारणों को भी थोड़ा और विस्तार से समझाया जा सकता था ताकि कहानी अधिक ठोस लगे।
क्यों देखें ये फिल्म?
'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जॉम्बीज' एक साहसी प्रयोग है जो मनोरंजन के मामले में खरा उतरता है। यह उन लोगों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है जो रूटीन मसाला फिल्मों से हटकर कुछ नया देखना चाहते हैं। हालांकि इसमें कुछ कमियां हैं, लेकिन फिल्म की ऊर्जा, शानदार अभिनय और देसी ज़ोंबी का तड़का इसे एक बार देखने लायक बनाता है।
अगर आप अपने दोस्तों के साथ वीकेंड पर कुछ मजेदार और रोमांचक देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपको हंसाएगी भी और कुर्सी से बांधे भी रखेगी!