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नेहा बोरा को पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने होंगे, क्या होता है Peace Bond? सिग्नेचर ना करें तो क्या होगा

 Written By: Kajal Kumari
 Published : Oct 24, 2026 09:14 am IST,  Updated : Oct 24, 2026 09:14 am IST

दिल्ली हाई कोर्ट ने आईसा नेता नेहा बोरा की याचिका खारिज कर दी और उन्हें 10,000 रुपये के पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने का आदेश दिया है। ऐसे में जानिए क्या होता है पीस बॉन्ड, इसपर अगर हस्ताक्षर ना करें तो क्या होगा?

नेहा बोरा को हाई कोर्ट का आदेश- India TV Hindi
नेहा बोरा को हाई कोर्ट का आदेश

Highlights

  • नेहा बोरा को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका
  • क्या होता है पीस बॉन्ड?
  • पीस बॉन्ड का उल्लंघन करने से क्या होगा?

दिल्ली हाई कोर्ट ने आईसा नेता नेहा बोरा की उस याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट (SEM Court) के उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का बॉन्ड और एक जमानती नियुक्त करने को कहा गया था। हालांकि, कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को कुछ निर्देश जारी किए हैं, जिनमें बोरा को सभी प्रासंगिक सामग्री उपलब्ध कराना शामिल है।फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा, "मैं इस स्तर पर इस रिट याचिका को खारिज कर रहा हूं।" 

नेहा बोरा को भरना ही होगा पीस बॉन्ड

चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध मार्च के दौरान नेहा बोरा को एसईएम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी किया गया था और इस नोटिस में उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने और शांति बनाए रखने के लिए 10 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरने को कहा गया था। नेहा बोरा ने इसी नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जो याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी है और अब नेहा बोरा को 10,000 रुपये का पीस बॉन्ड भरना होगा। नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था, जब वह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने जा रही थीं। इसके अगले दिन 17 अक्टूबर को उन्हें रिहा कर दिया गया था। 

कब भरवाया जाता है पीस बाॅन्ड?
बीएनएसएस की धारा 126 एसईएम को इस तरह के बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराने का अधिकार देती है यदि ऐसी विश्वसनीय जानकारी हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग करने, सार्वजनिक शांति में खलल डालने, या कोई ऐसा गलत कृत्य करने की संभावना रखता है, जिससे व्यवधान पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में व्यवधान पहुंचाने वाले संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाता है और उससे पूछा जाता है कि उसे एक निश्चित अवधि तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का आदेश क्यों न दिया जाए। पीस बॉन्ड की समयसीमा अधिकतम एक साल हो सकती है।

क्या होता है पीस बॉन्ड?
पीस बॉन्ड का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 126 में दिया गया है। बीएनएसएस के अध्याय 9 में इसे लिए कहा गया है, इसे किसी अपराध की सज़ा के तौर पर नहीं, बल्कि एक प्रिवेंटिव क़दम के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। जब प्रशासन को लगता है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियों से सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है, तो उससे एक निश्चित अवधि के लिए शांति बनाए रखने का लिखित वादा लिया जाता है और इसे ही 'पीस बॉन्ड' कहा जाता है।

पीस बॉन्ड भरने का क्या मतलब है? 
पीस बॉन्ड भरने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति अपने सभी अधिकार खो देता है। बल्कि उसे इसमें लागू होने वाली सभी शर्तों को पालन करना जरूरी होता है। उसे यह भी देखना होता है किसी प्रदर्शन पर रोक है या नहीं, यह उस जगह से जुड़े आदेशों और लागू कानून पर भी निर्भर करता है। इसी तरह, किसी के खिलाफ पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ या नहीं, यह उसके वास्तविक दस्तावेज और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता है।

 

हस्ताक्षर करने से इनकार करने पर क्या होता है?
बीएनएसएस की धारा 136(3) के तहत अगर कोई व्यक्ति पीस बॉन्ड भरने से मना करता है या मजिस्ट्रेट की ओर से मांगे गए ज़मानती रकम को पेश नहीं कर पाता है, तो उसे हिरासत में लिया जा सकता है और मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को तब तक न्यायिक हिरासत में भेज सकता है, जब तक कि वह बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं कर देता या मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती। इससे संबंधिंत जांच ख़त्म करने की ऊपरी समय-सीमा छह महीने है।

पीस बॉन्ड का उल्लंघन किया तो क्या होगा?
बीएनएसएस की धारा 141(1)(b) के तहत, अगर मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि किसी व्यक्ति ने भरे गए पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो वह उस व्यक्ति को गिरफ़्तार करने और जेल भेजने का आदेश दे सकता है। इसके अलावा, पुलिस को अगर लगता है कि वह व्यक्ति कोई संज्ञेय अपराध करने वाला है, तो वह धारा 170 के तहत उसे फिर से प्रिवेंटिव हिरासत में ले सकती है। अगर यह साबित हो जाता है कि व्यक्ति ने पीस बॉन्ड का उल्लंघन किया है, तो धारा 141(1)(ख) के तहत मजिस्ट्रेट उसे उस बॉन्ड की बची हुई अवधि तक के लिए जेल में रखने का आदेश दे सकता है। 

कौन होते हैं स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM)?
मजिस्ट्रेट न्यायपालिका का हिस्सा होते हैं, जबकि एसईएम यानी स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) सरकार और प्रशासन के अधीन काम करते हैं। दिल्ली में पुलिस के असिस्टेंट कमिश्नर रैंक के अधिकारियों को एसईएम की शक्तियां दी गई हैं, जिससे प्रदर्शन के दौरान ऐसी स्थिति पैदा होती है, जहां पुलिस ही किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करती है। इस मामले में पुलिस ही शिकायतकर्ता होती है और पुलिस अधिकारी ही एसईएम के रूप में यह तय करता है कि व्यक्ति को जेल भेजना है या नहीं। 

दिल्ली हाई कोर्ट ने उठाया था सवाल
साल 2018 के फ़ैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि इन शक्तियों के इस्तेमाल में एक "स्पष्ट पूर्वाग्रह" दिखता है क्योंकि जेल भेजे गए लोगों में एक बड़ा प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय और समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों का होता है, जो भारी-भरकम ज़मानत राशि या ज़मानती का इंतज़ाम नहीं कर पाते और लंबे समय तक जेल में रहने को मजबूर होते हैं। हाई कोर्ट ने दिल्ली में केवल एक साल के भीतर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को इन प्रावधानों के तहत जेल भेजे जाने पर भी सवाल उठाया था। 

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