Highlights
- फ्रांस में क्यों सड़कों पर उतरे छात्र
- छात्रों की क्या है डिमांड
- सरकार ने क्या कहा
फ्रांस में स्कूलों में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच शिक्षा मंत्री ने छात्रों से उनकी राय जानने के लिए कार्यक्रम शुरू करने और शिक्षकों की भर्ती करने का ऐलान किया है। फ्रांस में हो रहा विरोध प्रदर्शन पर अब सियासी रंग भी चढ़ने लगा है। बेहतर हालात की मांग को लेकर फ्रांस भर में छात्र सितंबर के आखिर से ही सैकड़ों हाई स्कूलों के गेट बंद कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों के साथ छिटपुट झड़पें भी हुई हैं।
इसके बाद देश भर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच, प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने पूरे फ्रांस में इस हफ़्ते हाई स्कूल की कक्षाएं बंद कर दी हैं। मंगलवार को जब हज़ारों लोग कई शहरों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग (जैसे कि अनुपस्थित शिक्षकों की जगह नए शिक्षक रखना, लंच ब्रेक का समय बढ़ाना और स्कूल के समय में बदलाव करना) को लेकर रैलियां कर रहे थे, तो पुलिस ने हाई स्कूलों को ब्लॉक करने वाले प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े।

अधिकारियों के मुताबिक, पूरे देश में प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग ढाई लाख थी, लेकिन आयोजकों का अनुमान था कि छात्रों और कार्यकर्ताओं की संख्या करीब पांच लाख थी। हाई स्कूल स्टूडेंट्स यूनियन ने बताया कि लगभग 2,000 हाई स्कूलों को ब्लॉक कर दिया गया या दिन भर के लिए बंद रखा गया। प्रदर्शनकारी हाथों में ऐसे पोस्टर लेकर सड़कों पर उतरे जिन पर लिखा था, उन्हें हमारी कोई परवाह नहीं है और जीवित रहें या पढ़ाई करें। स्ट्रासबर्ग, ल्योन और रेनेस में विरोध प्रदर्शन कई बार हिंसक हो गए; पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर आगजनी की और चीज़ें फेंकीं।
छात्रों की क्या है डिमांड
- स्टूडेंट्स की शिकायत है कि जब टीचर एब्सेंट होते हैं, तो अक्सर उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं मिलता। इससे क्लास कैंसिल हो जाती हैं या स्टूडेंट्स को वे लेसन नहीं मिल पाते जो उन्हें मिलने चाहिए। सरकार ने अब वादा किया है कि वह देखेगी कि एब्सेंट टीचरों की जगह कैसे भरी जा सकती है।
- बहुत ज़्यादा भीड़ वाले क्लासरूम एक और बड़ी शिकायत है। स्टूडेंट्स और टीचर का कहना है कि खचाखच भरे कमरों में पढ़ाना मुश्किल होता है और हर स्टूडेंट पर अलग से ध्यान देने के लिए कम समय मिलता है। स्टाफ की कमी इस समस्या को और बढ़ा सकती है।
- विरोध-प्रदर्शनों ने पुरानी और ठीक से देख-रेख न होने वाली इमारतों की ओर ध्यान खींचा है। स्टूडेंट्स ने पानी के रिसाव से लेकर चूहों के आतंक तक की समस्याओं के बारे में बताया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि बच्चों को ऐसे स्कूलों में नहीं पढ़ना चाहिए जहाँ बेसिक देख-रेख की भी कमी हो।
- स्टूडेंट्स स्कूल के दिन की अवधि पर भी सवाल उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने मंत्रियों को उन शेड्यूल की समीक्षा करने का आदेश दिया है जो सुबह लगभग 8 बजे से शाम 6 बजे तक चल सकते हैं, साथ ही यह भी देखने को कहा है कि क्या स्टूडेंट्स को लंबे लंच ब्रेक की ज़रूरत है।
- स्टूडेंट्स का कहना है कि स्कूलों में रिसोर्स की कमी है, एक बड़ी शिकायत फंडिंग को लेकर है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सालों से कम निवेश के कारण स्कूल स्टाफ, रखरखाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में शिक्षा पर होने वाला खर्च महंगाई के मुकाबले कम रहा है।
- हर छात्र का अनुभव एक जैसा नहीं होता। स्कूलों और इलाकों के बीच असमानता भी एक चिंता का विषय है, खासकर पिछड़े इलाकों के छात्रों के लिए। ये विरोध प्रदर्शन सितंबर में पेरिस के आसपास के पिछड़े इलाकों में शुरू हुए और फिर पूरे देश में फैल गए। इन इलाकों के छात्रों का कहना है कि उनकी शिक्षा की गुणवत्ता इस बात पर काफी हद तक निर्भर करती है कि वे कहाँ रहते हैं।
- चिंताएं सिर्फ़ इमारतों और शिक्षकों तक ही सीमित नहीं हैं। छात्रों ने पढ़ाई के दबाव, सपोर्ट स्टाफ़ तक पहुंच और फ्रांस की शिक्षा प्रणाली व यूनिवर्सिटी में दाखिले की प्रक्रिया से जुड़ी मुश्किलों जैसे मुद्दे भी उठाए हैं। कई प्रदर्शनकारियों के लिए ये सभी मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। शिक्षकों की कमी, खचाखच भरी कक्षाएं, खराब इमारतें और लंबे स्कूल के दिन - ये सभी मिलकर स्कूल के पहले से ही मुश्किल अनुभव को और तनावपूर्ण बना देते हैं।

पीएम लेकोर्नू ने क्या कहा
ये विरोध प्रदर्शन दो हफ़्ते पहले पेरिस के सबसे गरीब इलाक़ों में शुरू हुए थे और देखते ही देखते पूरे देश में फैल गए। सरकार का कहना है कि यह आंदोलन अब शहरी हिंसा में बदल गया है और कुछ रैलियों में दंगा-रोधी पुलिस तैनात की गई है। प्रधानमंत्री लेकोर्नू ने क्लास रद्द करने की घोषणा करते हुए कहा, "हाई स्कूल को जलाने से स्कूल की इमारतों की हालत में सुधार नहीं होता है। उन्होंने मंत्रियों को यह भी आदेश दिया कि वे अक्टूबर के आखिर तक छात्रों की मांगों पर ध्यान दें। इन मांगों में टीचरों की जगह नए टीचर रखना, स्कूल के समय में बदलाव, लंच ब्रेक और पुरानी हो चुकी इमारतों की मरम्मत शामिल है।
फ्रांस के गृह मंत्रालय ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन शुरू होने के बाद से उसने 6,100 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें से ज़्यादातर 18 साल से कम उम्र के हैं। न्याय मंत्रालय ने घोषणा की कि 1,800 से ज़्यादा लोगों पर मुकदमा चलाया जाएगा, जिनमें 1,483 नाबालिग शामिल हैं। लेकोर्नू के अनुसार, विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कम से कम 215 किशोर और 715 पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं।

सरकार के लिए बना गर्दन की फांस
उत्तरी शहर लेंस में हाई स्कूल के छात्रों और पुलिस के बीच झड़प के दौरान एक 15 साल के लड़के का हाथ उड़ गया। सरकार ने कहा कि लगभग 200 से 250 प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर चीजें फेंकी थीं। फ्रांसीसी अखबार 'ला वॉइक्स डू नॉर्ड' ने बताया कि विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस का ग्रेनेड उठाने के बाद उस किशोर का हाथ और बांह का कुछ हिस्सा कट गया।
ट्रंप ने की बड़ी टिप्पणी
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए बिना किसी सबूत के बेतहाशा हो रहे इमिग्रेशन और मुसलमानों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक पोस्ट में, ट्रंप ने दावा किया कि "फ्रांस में जो हो रहा है, वह बेकाबू बड़े पैमाने पर हो रहे माइग्रेशन से कम नहीं है। यह स्कूलों के बारे में नहीं है, यह इस्लाम के बारे में है जो कभी महान रहे देश पर कब्ज़ा करना चाहता है!"
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