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CEC अधिनियम की धारा 18 क्या है? जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को दे सकती है राहत

 Written By: Kajal Kumari
 Published : Oct 27, 2026 03:04 pm IST,  Updated : Oct 27, 2026 03:04 pm IST

सुप्रीम कोर्ट में अपने काउंटर-एफिडेविट में, ECI ने तर्क दिया कि CEC पर रोक लगाना सेक्शन 18 के खिलाफ होगा, जो यह बताता है कि कई सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था को अपना काम कैसे करना चाहिए। जानिए क्या है ये नियम?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार- India TV Hindi
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार Image Source : FILE PHOTO (PTI)

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में, भारत निर्वाचन आयोग ने तर्क दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को काम करने से रोकना धारा 18 के खिलाफ होगा। यह धारा तय करती है कि कई सदस्यों वाले इस संवैधानिक निकाय को अपना कामकाज किस तरह से संचालित करना चाहिए। आयोग ने कहा है कि मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने उन आरोपों को भी खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ने एकतरफा फैसला लिया।

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 18 का हवाला देते हुए, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका का विरोध किया है। इसके जरिए चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े कानूनी प्रावधान पर ध्यान केंद्रित हुआ है। इस विवाद ने एक बार फिर इस बात पर ध्यान खींचा है कि आयोग के प्रमुख के रूप में CEC की भूमिका और चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय लेने की शक्तियों के बीच क्या अंतर है। 

CEC अधिनियम की धारा 18 क्या है?

  • 2023 के अधिनियम की धारा 18, जिसका काम 'कार्यों का निपटारा' (Disposal Of Business) है, चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज के लिए एक कानूनी ढांचा तय करती है।
  • इसमें दो मुख्य प्रावधान हैं, जो यह तय करते हैं कि आयोग किस तरह फैसले लेता है और अपने सदस्यों के बीच जिम्मेदारियां कैसे बांटता है।
  • इसमें से, धारा 18(1) के तहत, चुनाव आयोग सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय के माध्यम से अपने कामकाज की प्रक्रिया को विनियमित कर सकता है, और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) तथा अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच काम का बंटवारा कर सकता है।
  • धारा 18(2) में यह प्रावधान है कि आयोग के सभी कामकाज, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किए जाने चाहिए।
  • यदि किसी मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग होती है, तो निर्णय बहुमत की राय के आधार पर लिया जाना चाहिए।
  • संक्षेप में, यह प्रावधान निर्णय लेने के लिए सर्वसम्मति को प्राथमिकता देता है, लेकिन सदस्यों के बीच असहमति होने की स्थिति में बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था भी करता है।
  • आयोग की कार्य-प्रक्रियाओं को विनियमित करने और सदस्यों के बीच काम के बंटवारे से जुड़े निर्णयों के लिए भी सर्वसम्मति आवश्यक है।
  • यह प्रावधान हर निर्णय के लिए पूर्ण सर्वसम्मति की अनिवार्यता नहीं रखता है। इसके बजाय, असहमति की स्थिति में बहुमत से निर्णय लेने का स्पष्ट प्रावधान करता है।

खास बातें-

  • 3 सदस्यीय चुनाव आयोग में बहुमत के नियम का मतलब है कि दो चुनाव आयुक्तों का मत मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर भारी पड़ सकता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 324(3) के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त आयोग के अध्यक्ष होते हैं, लेकिन 2023 के इस अधिनियम के तहत उन्हें कोई 'वीटो पावर' या निर्णायक वोट (casting vote) का अधिकार नहीं दिया गया है।
  • यह धारा हाल ही में चुनाव आयोग के कामकाज और निर्णयों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों में चर्चा और याचिकाओं का केंद्र बनी हुई है

धारा 18 क्यों महत्वपूर्ण है?

  1. सुप्रीम कोर्ट के मामले में धारा 18  तब और भी महत्वपूर्ण हो गया है जब ऐसे आरोप लगे हैं कि 'SIR' प्रक्रिया से जुड़े अहम फैसले, दो अन्य चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी  की आपत्तियों के बावजूद लिए गए थे। यह विवाद तब और बढ़ गया जब सितंबर 2026 में 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने रिपोर्ट दी कि दो आयुक्तों ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जो उनके अनुसार उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए थे।
  2. 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में इन आपत्तियों में फॉर्म 6 से जुड़ी नई मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में बदलाव, ERONET इलेक्टोरल रोल डेटाबेस तक पहुंच, आयोग के भीतर काम का बंटवारा और इलेक्टोरल रोल प्रबंधन से जुड़े फैसले शामिल थे। इन आरोपों से एक कानूनी सवाल यह उठता है कि क्या चुनाव आयोग के फैसलों में धारा 18 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था, खासकर उन मामलों में जहां अलग-अलग सदस्यों ने आपत्तियां दर्ज कराई थीं या उनकी राय अलग थी।
  3. CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिका में इस प्रावधान का हवाला देते हुए तर्क दिया गया है कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल CEC अकेले नहीं कर सकते। इसमें उन फैसलों के खिलाफ राहत मांगी गई है, जो कथित तौर पर जरूरी सहमति के बिना या आयुक्तों के बहुमत की राय के विपरीत लिए गए थे।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से क्या कहा?

अपने जवाबी हलफनामे में, चुनाव आयोग (ECI) ने एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए तीनों SIR आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। आयोग ने कहा कि फैसला लेने की प्रक्रिया के दौरान सदस्यों या अधिकारियों के बीच जो सुझाव, टिप्पणियां और सवाल साझा किए गए थे, उन्हें धारा 18 के तहत चुनाव आयोग का 'फैसला' नहीं माना जा सकता।

हलफनामे के अनुसार, आयोग के सामने रखे गए मामलों पर विचार-विमर्श किया गया। इसके लिए फाइलों और संबंधित दस्तावेजों को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मंजूरी के लिए भेजा गया था। फैसलों को आधिकारिक फाइलों में दर्ज किया गया और ECI सचिवालय के माध्यम से लागू किया गया। आयोग ने यह भी बताया कि इस जवाबी हलफनामे को भी तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से मंजूरी मिली थी।

ECI ने तर्क दिया कि यह याचिका एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित है, और याचिकाकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री आयोग पर लगाए गए आरोपों को साबित नहीं करती है। इसमें आगे यह तर्क दिया गया कि CEC को काम करने से रोकने का निर्देश, आयोग के कामकाज को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे के खिलाफ होगा। इसलिए, ECI ने याचिका को खारिज करने की मांग की है। उनका कहना है कि SIR आदेश संविधान के अनुच्छेद 324 और लागू कानूनों के अनुसार ही जारी किए गए थे।

ज्ञानेश कुमार को कैसे मिल सकती है राहत?
धारा 18, चुनाव आयोग को एक ऐसी संस्था के रूप में नहीं देखती जिसके फैसले केवल उसके प्रमुख द्वारा लिए जाते हों, बल्कि यह संस्थागत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर जोर देती है। यह प्रावधान आंतरिक प्रक्रियाओं के नियमन और काम के बंटवारे और अन्य मामलों पर लिए जाने वाले फैसलों के बीच अंतर करता है। अन्य मामलों के लिए, धारा 18(2) में कहा गया है कि जहां तक ​​संभव हो सर्वसम्मति से फैसला लिया जाए, और यदि मतभेद हों, तो बहुमत से निर्णय लिया जाए।

नतीजतन, यह कानूनी विवाद केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि चर्चा के दौरान अलग-अलग आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां जताईं या नहीं। बल्कि, सवाल यह भी है कि क्या उन आपत्तियों का मतलब किसी ऐसे मामले पर विचारों का मतभेद था जिस पर फैसला लिया जाना था, और क्या कानून द्वारा तय की गई प्रक्रिया का पालन किया गया था। ECI का मानना ​​है कि आंतरिक टिप्पणियों और सवालों को औपचारिक फैसलों के बराबर नहीं माना जाना चाहिए, और न ही इन्हें इस बात का सबूत माना जा सकता है कि आयोग के अंतिम आदेशों में आम सहमति नहीं थी।

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