चाणक्य नीति के ये विचार खोलते हैं जीवन के गहरे राज, जो बताते हैं कब किसका साथ और किसका त्याग है जरूरी
चाणक्य नीति के ये विचार खोलते हैं जीवन के गहरे राज, जो बताते हैं कब किसका साथ और किसका त्याग है जरूरी
आचार्य चाणक्य के विचार आज भी जीवन, ज्ञान और रिश्तों को समझने की सीख देते हैं। यहां हम आपके लिए चाणक्य नीति से कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण श्लोक लेकर आए हैं। जानिए उनके 5 श्लोकों के अर्थ और उनसे मिलने वाली सीख।
Published : Oct 12, 2026 04:05 pm IST, Updated : Oct 12, 2026 04:05 pm IST
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आचार्य चाणक्य की चाणक्य नीति में जीवन, ज्ञान, रिश्तों और व्यवहार से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। उनके श्लोक व्यक्ति को परिस्थितियों को समझने और सही निर्णय लेने की सीख देते हैं। कुछ श्लोक बताते हैं कि जीवन में किन बातों का महत्व है, तो कुछ ज्ञान, अभ्यास और संबंधों को लेकर विचार करने की प्रेरणा देते हैं। आचार्य चाणक्य के ये 5 श्लोक जीवन की बड़ी सीख देते हैं। आइए चाणक्य के इन 5 श्लोकों को उनके अर्थ के साथ समझते हैं।
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एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभि रणः।
अर्थ: तपस्या अकेले की जाती है, अध्ययन दो लोगों द्वारा, गायन तीन लोगों द्वारा, यात्रा चार लोगों द्वारा और युद्ध कई लोगों के साथ किया जाता है। गतिविधियां प्रतिभागियों की संख्या के अनुसार बदलती रहती हैं।
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अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबान्धवाः।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्यं दरिद्रता॥
अर्थ: पुत्रहीन व्यक्ति के लिए घर सूना हो जाता है, जिसके भाई न हों उसके लिए दिशाएं सूनी हो जाती हैं, मूर्ख का हृदय सूना होता है, लेकिन निर्धन व्यक्ति के लिए सब कुछ सूना हो जाता है।
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अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धनं जरा।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणाम् आतपो जरा॥
अर्थ: इस श्लोक में मनुष्य के लिए अधिक यात्रा, घोड़े के लिए बंधन, स्त्री के लिए मैथुन का अभाव और वस्त्रों के लिए धूप को क्षय या पुरानापन आने का कारण बताया गया है।
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अनभ्यासे विषं विद्या अजीर्णे भोजनं विषम्।
विषं सभा दरिद्रस्य वृद्धस्य तरुणी विषम्॥
अर्थ: अभ्यास न करने पर विद्या विष के समान हो जाती है। अजीर्ण होने पर भोजन विष बन जाता है। निर्धन व्यक्ति के लिए सभा और वृद्ध व्यक्ति के लिए तरुणी विष के समान बताई गई है।
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त्यजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्या निः स्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्॥
अर्थ: व्यक्ति को चाहिए कि वह ऐसे धर्म का त्याग कर दे, जिसमें दया और ममता आदि का अभाव हो। इसी प्रकार विद्या से हीन गुरु का और सदा क्रोध करने वाली स्त्री का त्याग भी श्रेयस्कर है। जिन बन्धु-बान्धवों में प्रेम अथवा स्नेह का अभाव हो, उनका भी त्याग कर देना चाहिए।