अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि मुस्लिम शादी को 'मुबारात' के जरिए, यानी पति-पत्नी की आपसी मौखिक सहमति से, बिना किसी लिखित समझौते के खत्म किया जा सकता है। जस्टिस ए. वाई. कोगजे और जस्टिस एन. एस. संजय गौड़ा की बेंच ने यह टिप्पणी राजकोट के एक मुस्लिम दंपति की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिन्होंने अपनी शादी को 'मुबारात' के जरिए खत्म करने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने राजकोट फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दंपति की याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि 'मुबारात' के लिए लिखित समझौता जरूरी है।
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फैमिली कोर्ट में दायर की थी याचिका
बता दें कि राजकोट के एक युवा मुस्लिम दंपति ने आपसी अनबन के बाद फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने 'मुबारात' के जरिए अपनी शादी को खत्म कर लिया है, जो मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 के तहत मान्य है। लेकिन फैमिली कोर्ट ने उनकी याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया कि 'मुबारात' के लिए लिखित समझौता होना जरूरी है। दंपति ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि शरीयत के मुताबिक 'मुबारात' के लिए लिखित समझौता जरूरी नहीं है। हाई कोर्ट ने उनकी दलील को सही ठहराते हुए कहा कि कुरान, हदीस और मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर 'मुबारात' के लिए मौखिक सहमति ही काफी है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, 'शरीयत में ऐसा कोई नियम नहीं है कि 'मुबारात' के लिए लिखित समझौता जरूरी हो। न ही कोई रजिस्टर मेंटेन करने की प्रथा है जिसमें आपसी सहमति से खत्म हुए निकाह को दर्ज किया जाए। मुबारात के लिए पति-पत्नी की आपसी सहमति का मौखिक इजहार ही निकाह को खत्म करने के लिए काफी है।' हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया और मामले को वापस फैमिली कोर्ट को भेजते हुए 3 महीने के अंदर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को वैध माना जाए और इसकी सुनवाई मेरिट के आधार पर की जाए।
3 महीने के अंदर सुनवाई पूरी करने का निर्देश
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की उम्र और भविष्य को ध्यान में रखते हुए फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मामले की सुनवाई जल्द से जल्द, यानी तीन महीने के अंदर पूरी करे। कोर्ट ने कहा, 'हमें इस आदेश की प्रति मिलने की तारीख से तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने की उम्मीद है।' बता दें कि 'मुबारात' मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक का एक तरीका है, जिसमें पति-पत्नी आपसी सहमति से अपनी शादी को खत्म करते हैं। यह तलाक का एक शांतिपूर्ण और सम्मानजनक तरीका है, जिसमें दोनों पक्ष बिना किसी विवाद के अलग होने का फैसला लेते हैं। इस फैसले से उन दंपतियों को राहत मिलेगी जो आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं, लेकिन लिखित समझौते की कमी के कारण कानूनी अड़चनों का सामना कर रहे थे।