दिल्ली एनसीआर में आज हर किसी की जुबां पर सिर्फ और सिर्फ प्रदूषण की बात है, लोग चाहते हैं कि प्रदूषण को लेकर कोई सख्त कदम उठाए जाएं। क्योंकि ये प्रदूषण न सिर्फ लोगों को बीमार कर रहा है बल्कि शरीर के अंगों को भीतर से डैमेज कर रहा है। दिल और दिमाग पर प्रदूषण का गहरा असर हो रहा है। ये सब हम नहीं कह रहे हैं बल्कि डॉक्टर्स का कहना है।
दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल के डॉक्टर अस्तिक जोशी (वेदा चाइल्ड एंड एडोलसेंट डेवलपमेंटल-बिहेवियरल क्लिनिक) की मानें तो आज के समय में वायु प्रदूषण केवल सांस की बीमारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डाल रहा है। खासतौर से जब एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) लगातार हाई लेवल पर बना रहता है। ऐसे में प्रदूषण के मनोचिकित्सीय प्रभावों को नज़रअंदाज़ करना खतरनाक साबित हो सकता है।
बच्चों और युवाओं का दिमाग विकासशील अवस्था में होता है। इसीलिए युवाओं की तुलना में वायु प्रदूषण से होने वाली न्यूरोटॉक्सिसिटी (मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों) के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और विषैले तत्व सीधे मस्तिष्क के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।
हाई AQI के कॉन्टेक्ट में आने से शरीर में सूजन की एक श्रृंखला (इन्फ्लेमेटरी कैस्केड) एक्टिव हो जाती है। सर्दियों में तापमान गिरने की वजह से इसका असर और भी तेज हो जाता है। यह सूजन दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है और न्यूरोट्रांसमीटर के रास्ते में रुकावट पैदा कर सकती है। जिससे बच्चों को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, सीखने की क्षमता में कमी, चिड़चिड़ापन, उदासी और व्यवहार संबंधी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं।
खासतौर से चिंता का विषय यह है कि बढ़ा हुआ AQI उन बच्चों और युवाओं में लक्षणों को और अधिक गंभीर बना सकता है, जो पहले से ही एडीएचडी (ADHD), ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर या मूड डिसऑर्डर जैसी मानसिक स्थितियों से जूझ रहे हैं। ऐसे मामलों में बेचैनी, आवेगशीलता, आक्रामकता या अवसाद के लक्षण बढ़ सकते हैं।
दूसरी ओर, प्रदूषित वातावरण में सांस लेने के लिए शरीर को अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे रेस्पिरेटरी ड्राइव बढ़ जाती है। सांस लेने में की गई अतिरिक्त कोशिश भी दिमाग पर असर डालती है। खासकर वे बच्चे और किशोर जिन्हें पहले से ऑटिज़्म, अस्थमा या एंग्ज़ायटी डिसऑर्डर का निदान हो चुका है, उनमें घबराहट, पैनिक, नींद की समस्या और व्यवहार में अस्थिरता अधिक देखने को मिल सकती है।
इसलिए जरूरी है कि वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरणीय या सांस की समस्या न मानकर एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में भी देखें। बच्चों और किशोरों को उच्च AQI के दिनों में बाहरी गतिविधियों से बचाना, मास्क का प्रयोग, घर के भीतर स्वच्छ हवा बनाए रखना और किसी भी व्यवहारिक या भावनात्मक बदलाव पर समय रहते एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है। क्योंकि अच्छी हवा केवल फेफड़ों ही नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के दिमाग और मानसिक संतुलन के लिए भी जरूरी है।
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