तिरुपति: मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को इस बात को लेकर संदेह है कि केंद्र सरकार राज्य के बंटवारे की वजह से हुए जनता के कष्ट दूर करने के लिए आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देगी। नायडू इस मुद्दे पर केंद्र से किसी टकराव या कानूनी लड़ाई से परहेज कर रहे हैं।
इस वार्षिक सम्मेलन के दौरान पार्टी सदस्यों के एक समूह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार के प्रति अपना रुख कड़ा करने एवं राज्य को विशेष दर्जा के लिए केंद्र पर दबाव बनाने के लिए मुख्यमंत्री पर जोर डाला। राज्य के बंटवारे के समय तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संसद में इसका वादा किया था। वर्ष 2014 में तेलंगाना अलग हुआ और राज्य दो भागों में बंट गया।
इसके पीछे विचार यह था कि बंटवारे से आंध्र प्रदेश को जो नुकसान हो, उसकी क्षतिपूर्ति की जाए, क्योंकि सभी औद्योगिक एवं वाणिज्यिक विकास राजधानी हैदराबाद एवं उसके आस पास के क्षेत्र में केंद्रित थे। भौगोलिक रूप से राजधानी हैदराबाद अब तेलंगाना का हिस्सा है। जिन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाता है, उन्हें इसके तहत बड़ा वित्तीय पैकेज दिया जाता है। सामान्य तौर पर भारत में यह दर्जा आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों को मिलता है।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने वादा किया था कि यदि वह फिर सत्ता में लौटी तो पांच साल के लिए आंध्र प्रदेश को यह दर्जा देगी। भाजपा उससे भी एक कदम आगे निकली और उसने 10 साल के लिए यह दर्जा देने का वादा किया था। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) के नेतृत्व वाली सरकार के केंद्र में सत्ता संभाले दो साल से भी अधिक समय हो चुके हैं, लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है। उल्लेखनीय है कि तेदेपा राजग में शामिल है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 17 मई को नई दिल्ली में हुई बैठक के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया है कि विशेष दर्जा सहित सभी लंबित मुद्दों के समाधान के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई जाएगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि ये आश्वासन कब पूरे होंगे।