नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को खत्म करने के लिए भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बेचने का फैसला लिया है। वियतनाम के अलावा 15 और बाजारों पर भी भारत की नजर है। विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली का ये प्रयास उसकी चीन की बढ़ती सैन्य मुखरता को लेकर चिंता को जाहिर करता है।
वियतनाम बीते पांच साल से ब्रह्मोस मिसाइल की मांग कर रहा है तो वहीं हनोई की ब्रह्मोस खरीदने का आवेदन भारत के पास 2011 से पड़ा है लेकिन चीन आवाज की गति से तीन गुना तेज और दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस को अस्थिरता पैदा करने वाले हथियार के तौर पर देखता है। भारत इसी के मद्देनजर चीन की नाराजगी की आशंका के चलते हनोई के साथ सौदा करने से हिचकता रहा है और पिछली यूपीए सरकार ने इसी वजह से वियतनाम को यह मिसाइल नहीं दी थी।
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वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश नीति समिति के एशिया रक्षा कार्यक्रम के निदेशक जेफएम स्मिथ का कहना है कि भारत के नीति निर्माताओं को इस बात की आशंका रही है कि यह कहीं चीन की ओर से कोई आक्रमक या अनचाही प्रतिक्रिया की वजह न बन जाए। पीएम मोदी और उनके सलाहकारों ने इस सोच को बदल दिया है जिससे अब भारत के अमेरिका, जापान और वियतनाम के साथ मजबूत संबंधों की वजह से चीन से मजबूती से बर्ताव कर सकता है।
चीन के साथ हाल में कई मुद्दों पर भारत की तल्खी सामने आई है। पाकिस्तान में मौजूद आतंकी अजहर मसूद को यूएन से बैन कराने की भारत की कोशिशों को चीन ने विफल कर दिया था। इसके अलावा न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप-NSG में भारत की एंट्री की कोशिशों में भी चीन ने अड़ंगा लगाने की कोशिश की। दक्षिण चीन सागर विवाद में चीन के विरोधी माने जाने वाले वियतनाम को मिसाइल देने का फैसला कर भारत ने विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया है।