नई दिल्ली: “आपराधिक न्याय प्रणाली (क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) की किसी एक कड़ी को दुरुस्त करने से काम नहीं चलेगा। इसमें व्यापक सुधारों से ही बात बनेगी।” यह कहना भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी और उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के SSP वैभव कृष्ण का है। वैभव कृष्ण का कहना है कि “किसी भी समाधान के लिए हमें सबसे पहले समस्या को समझना होगा। अपराध रोकने के लिए CJS (क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) में आवश्यक सुधार करने होंगे। पुलिस इसका विकल्प नहीं है।”
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CJS (क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) में सुधार को लेकर उन्होनें छह अलग-अलग कड़ियों पर ध्यान देने की बात कही। उन्होंने कहा कि “CJS में सुधार की पहली कड़ी FIR के मोर्चे पर न्यायिक हस्तक्षेप की दरकार होगी ताकि पुलिस अपने लिए सही लक्ष्य तय कर सके। दूसरी कड़ी जांच की गुणवत्ता से जुड़ी है। सभी राज्यों में जांच मुख्य रूप से इकबालिया बयानों पर अधिक और साक्ष्यों पर कम आधित होती है जबकि आदर्श रूप में जांच साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए।”
वैभव कृष्ण ने कहा कि “तीसरी कड़ी अभियोजन पक्ष को व्यापक रूप से सुधारने से जुड़ी है। निचली, सत्र अदालतों में अभियोजन अधिकारियों की गुणवत्ता गंभीर चिंता का विषय है। चौथी कड़ी के तहत विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं को कानून में जरूरी बदलावों के अनुसार शीघ्रता से निपटाना होगा। कई मामलों में जांच पूरी होने और अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद आरोप तय करने में कई साल लग जाते हैं। आरोप तय करना ही मुकदमें का पहले पड़ाव होता है।”
उन्होनें कहा कि “निचली अदालतें जांच अधिकारी की अनदेखी कर महिलाओं के जुड़े अपराधों में बयान दर्ज कराने में ही कई दिन लगा देती हैं। इस मौके पर निचली अदालतें असंवेदनशील नजर आती हैं।” वैभव कृष्ण ने कहा कि “पांचवी कड़ी जमानत रद्द करने की पूरी प्रक्रिया से जुड़ी है। वास्तव में आदतन अपराधियों से निपटने में अभियोजन के पास कोई रणनीति नहीं होता। वह बार-बार अपराध करते हैं लेकिन उन्हें पूर्व में मिली जमानत खारिज नहीं होता। क्या जमानत देने या न देने का अधिकार जिला पुलिस अधीक्षत क दिया जा सकता है।”
IPS अधिकारी वैभव कृष्ण ने कहा कि “आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारने की छठी कड़ी का संबंध दीवानी न्याय प्रणाली में समांतर सुधारों से जुड़ा है। असल में अपराध रोकना दोनों का साझा दायित्व है।” इसके अलावा उन्होंने अलग-अलग तरह के अपराधों से निपटने को लेकर कहा कि “मामलों की गंभीरता को लेकर प्रथमिकताएं तय की जानी चाहिए। जैसे- कई राज्यों ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए अलग पुलिस स्टेशनों से निपटने की व्यवस्था शुरू की है। कुछ ऐसे ही इंतेजाम दूसरे आम अपराधों से निपटने के लिए किए जा सकते हैं।”