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लेकिन इस घटना के बाद पीर हाजी अली शाह को बुरे-बुरे ख़्वाब आने लगे कि उन्होंने अपना अंगूठा ज़मीन में धसाकर पृथ्वी को ज़ख़्मी कर दिया। उसी दिन से वह गुमसुम रहने लगे और बीमार भी पड़ गए। फिर आपनी मां की इजाज़त लेकर वह अपने भाई के साथ भारत रवाना हो गए और मुंबई की उस जगह पहुंच गए जो दरगाह के क़रीब है। उनका भाई वापस अपने देश लौट गया।
पीर हाजी अली शाह ने अपने भाई के हाथ मां को एक ख़त भिजवाया और कहा कि उन्होंने इस्लाम के प्रचार के लिये अब यहीं रहने का फ़ैसला किया है और ये कि वह उन्हें इस बात के लिये माफ़ कर दें।
क्यों न मज़ार न कब्र चाहते थे पीर हाजी अली शाह, जानें अगली स्लाइड में