
hajiali
पीर हाजी अली शाह अपने अंतिम समय तक लोगों और श्रृद्धालुओं को इस्लाम के बारे में ज्ञान बांटते रहे। अपनी मौत के पहले उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि वे उन्हें कहीं दफ़्न न करें और उनके क़फ़न को समंदर में डाला जाए। उनकी अंतिम इच्छा पूरी की गई और ये दरगाह शरीफ़ उसी जगह है जहां उनका क़फ़न समंदर के बीच एक चट्टान पर आकर रुक गया था।
इसके बाद उसी जगह पर 1431 में उनकी याद में दरगाह बनाई गई। गुरुवार और शुक्रवार को दरगाह पर हर मज़हब के क़रीब 40,000 लोग आते हैं।
कभी कभी शुक्रवार को दरगाह पर क़व्वाली का भी आयोजन होता है।