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Rajat Sharma's Blog | BRICS: क्या मोदी, पुतिन, जिनपिंग नया world order लाएंगे?

 Written By: Rajat Sharma
 Published : Sep 11, 2026 04:35 pm IST,  Updated : Sep 11, 2026 04:36 pm IST

अब तक भारत दुनिया के बनाए नियमों का पालन करता था, अब भारत के पास अवसर है नए नियम लिखने का, जिनका दुनिया पालन करेगी। ये एक बहुत बड़ा बदलाव है। शी जिनपिंग का भारत आना एक महत्वपूर्ण घटना है।

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इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा। Image Source : INDIA TV

दिल्ली में होने वाली BRICS summit पर इस वक्त पूरी दुनिया की नज़रें लगी हुई है। सबको उम्मीद है कि बुद्ध के देश से युद्ध को खत्म करने का रास्ता निकल सकता है। रूस-यूक्रेन की जंग और अमेरिका-ईरान युद्ध पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से बात करेंगे।

7 साल बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी भारत आ रहे हैं। गलवान संघर्ष के बाद पहली बार भारत में शी जिनपिंग के साथ मोदी की वार्ता होगी। दुनिया की आधी आबादी और चालीस प्रतिशत GDP वाले देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दिल्ली में होंगे। कई बड़े व्यापारिक समझौते और रक्षा सौदे भी होंगे। रूस से S-500 मिसाइल सिस्टम और Sukhoi-57 फाइटर जेट ख़रीदने पर मुहर लग सकती है। शी जिनपिंग के साथ जो प्रतिनिधिमंडल आ रहा है, उसमें चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉरपोरेशन, चाइना कॉस्को शिपिंग कॉरपोरेशन और जनरल टेक्नोलॉजी ग्रुप जैसी सरकारी कंपनियों के अलावा अलीबाबा और ह्वावेई जैसी प्राइवेट कंपनियों के प्रतिनिधि भी होंगे।

चीन भारत के साथ व्यापार बढ़ाना चाहता है। भारत की कोशिश है कि व्यापार में संतुलन हो। इस वक्त दोनों देशों के बीच 151 अरब डॉलर का कारोबार होता है लेकिन इसमें से सिर्फ 20 अरब डॉलर का सामान भारत चीन को भेजता है, जबकि 131 अरब डॉलर का सामान चीन भारत को भेजता है। BRICS में भारत का भूमिका महत्वपूर्ण क्यों है, ये समझना ज़रूरी है। जबसे संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच फेल हुए, दुनिया एक नई व्यवस्था का इंतज़ार कर रही है। भारत अब इंतजार नहीं कर सकता इसीलिए BRICS जैसे फोरम का इस्तेमाल नए नियम, नई इबारत लिखने के लिए होना चाहिए, जैसे अमेरिका डालर पर निर्भरता कम करने का काम BRICS के जरिए हो सकता है। रूस ने भारत और चीन के साथ अपना ज़्यादातर कारोबार रूबल मुद्रा में किया है।

अब तक भारत दुनिया के बनाए नियमों का पालन करता था, अब भारत के पास अवसर है नए नियम लिखने का, जिनका दुनिया पालन करेगी। ये एक बहुत बड़ा बदलाव है। शी जिनपिंग का भारत आना एक महत्वपूर्ण घटना है। छह साल पहले गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प के बाद से चीन के साथ रिश्ते बिगड़ गए थे। लेकिन पिछले साल SCO की बैठक में नरेंद्र मोदी ने रिश्तों को नये सिरे से जोड़ा। फिर धुरंधर अजित डोवल ने बीजिंग जाकर शी जिनपिंग की भारत यात्रा को फाइनल किया। इसके लिए बहुत कुछ करना पड़ा।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तो चलता रहेगा पर चीन को भारत में बड़ा बाज़ार दिखाई देता है। भारत भी rare earth, इलेक्ट्रोनिक पुर्ज़े और मशीनरी के लिए चीन पर निर्भर है क्यों इनके न होने से हमारी फैक्ट्रियों की manufacturing पर असर पड़ता है। इस बार शी जिनपिंग का आना, मोदी से one to one मीटिंग करना, इस बात का संकेत है कि दोनों देश रिश्तों की अहमियत को समझते हैं। मोदी के दूसरे मेहमान राष्ट्रपति पुतिन हैं। उनसे पिछले तीन साल में दोस्ती और भी पक्की हो गई है। जब रूस संकट में था तो भारत ने उसका साथ दिया। अमेरिका के कड़े विरोध के बाद भी मोदी ने रूस से तेल ख़रीदा। अब जब ट्रंप दिल्ली में मोदी, जिनपिंग और पुतिन को साथ-साथ देखेंगे तो चिंता तो होगी। क्या एक नए world order की तैयारी हो रही है? ये सवाल भी उठेगा।

BRICS समिट की एक और बड़ी बात ये है कि दिल्ली में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान भी होंगे। सारी दुनिया जानती है कि ईरान ने ट्रंप को परेशान किया हुआ है। ट्रंप और ईरान की जंग ने पूरी दुनिया को बेहाल और बेबस कर दिया है। सारी दुनिया की नज़र मोदी पर है। क्या अमेरिका और ईरान की जंग रुकवाने का रास्ता दिल्ली से निकलेगा? आने वाले दो दिन में इन सारे सवालों के जवाब मिलेंगे।

मक्का पैक्ट: पाक ने सऊदी को भी दगा दिया

ब्रिक्स समिट से पाकिस्तान भी परेशान है। पिछले दिनों पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्किए के साथ मक्का संधि की थी। इसमें ये प्रावधान था कि अगर इनमें से किसी एक देश पर हमला हुआ, तो बाकी दो देश उसकी मदद करने आएंगे। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि यमन में मौजूद हूती बाग़ी, जिन्हें ईरान का समर्थन मिल रहा है, सऊदी अरब पर हमले कर रहे हैं। सउदी तेल रिफाइनरी और आवासीय इलाकों पर मिसाइलों से वार कर रहे हैं। ख्वाजा आसिफ अब सफाई दे रहे हैं कि मक्का संधि सामूहिक डिफेंस को लेकर है, न कि किसी देश पर हमले के लिए है।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री गोलमोल बातें कर रहे हैं। उन्होंने ईरान को भी अपना दोस्त बताया और सऊदी अरब के साथ मक्का पैक्ट की भी बात की। पाकिस्तान विदेश मंत्रालय ने कहा है कि हूती बागी हमले कर रहे हैं लेकिन ऐसे हमले पहले भी होते रहे हैं, इसलिए फिलहाल ऐसे हालात नहीं है कि पाकिस्तान को फौज भेजनी पड़े।

असल में जनरल आसिम मुनीर ने पाकिस्तान की जनता को मुग़ालते में रखने के लिए सऊदी अरब से pact किया। शर्त ये थी कि सऊदी पर अगर हमला होगा तो पाकिस्तान अपनी फ़ौज भेजेगा। अब हूतियों ने हमला कर दिया तो पाकिस्तान के नेता सिर्फ बयान बहादुर बने हुए हैं। पहले भी पाकिस्तान ने ट्रंप को झांसा दिया था कि वो ईरान से डील करवा देगा, ट्रंप के सामने सरेंडर करवा देगा लेकिन जब बात हुई तो पाकिस्तान की पोल खुल गई। उसके दावे खोखले साबित हुए। अब सऊदी पर हमला हुआ है तो पाकिस्तान एक बार फिर बुरी तरह expose हो गया। उसे लेने के देने पड़ गए।

जादवपुर: शुभेंदु तोड़ेंगे बंगाल में वामपंथियों का गढ़

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने विधानसभा में एक बिल पास करवाया। इस बिल में ये प्रावधान है कि बंगाल के विश्वविद्यालयों में शिक्षक और गैर शिक्षक कर्मियों का ट्रांसफर होगा। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि जो लोग ट्रांसफर-पोस्टिंग होने की खबर से मायूस हैं, वो अपनी नौकरी छोड़ सकते हैं। मुख्यमंत्री पूरे फायर मोड में नजर आए। उन्होंने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी ताकतों के साथ-साथ उनके समर्थकों का इलाज करने का समय आ गया है। शुभेंदु ने कहा, अगर जादवपुर वि.वि. में कश्मीर मांगे आजादी के नारे लगाए गए, तो इस बार गांधीजी की भाषा में नहीं, नेताजी की भाषा में जवाब दिया जाएगा।

इस बिल के पास होने से TMC भड़की हुई है। उनका आरोप है कि जादवपुर वि.वि. से प्रोफेसरों को नौकरी से निकालने के लिए सरकार ये बिल लाई है। शुभेंदु अधिकारी ने इसका जवाब दिया। कहा, जादवपुर यूनिवर्सिटी एक राष्ट्रीय विरासत है, उसे 1300 करोड़ रुपये का अनुदान दिया जाएगा लेकिन भारत को तोड़ने की बात करने वालों के 'टुकड़े-टुकड़े' कर दिए जाएंगे।

जादवपुर यूनिवर्सिटी को वामपंथियों का गढ़ माना जाता है। CPM के नेता मुस्तफिजुर रहमान ने कहा कि सरकार इस विश्वविद्यालय को बर्बाद करना चाहती है, इसके खिलाफ वामपंथी दल सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। ये तो कोई सीक्रेट नहीं है कि जादवपुर यूनिवर्सिटी पर बरसों से कम्युनिस्टों का कब्जा है। यहां की faculties से लेकर students तक ज्यादातर लोग वामपंथी विचारधारा को मानने वाले हैं। छात्र तो पास आउट  होकर चले जाते हैं, लेकिन कम्युनिस्ट विचारधारा वाले प्रोफेसर कई-कई बरसों तक इसी जगह टिके रहते हैं और अपना एजेंडा चलाते हैं। इस वर्चस्व को तोड़ने का शुभेंदु अधिकारी ने नायाब तरीका निकाला है। अब teachers का दूसरे विश्वविद्यालयों में ट्रांसफर किया जा सकेगा। इसीलिए वामपंथी दल इसका इतना विरोध कर रहे हैं।

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 10 सितंबर, 2026 का पूरा एपिसोड

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