सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एक ऐसा फ़ैसला सुना दिया है जिससे मोदी सरकार मुश्किल में पड़ सकती है। कोर्ट ने कहा है कि बार-बार अध्यादेश जारी करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है और केन्द्र या राज्य सरकार बार-बार अध्यादेश जारी नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों का मखौल उड़ाना है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक मामले में यह फैसला सुनाया है।
ग़ौरतलब है कि शत्रु सम्पत्ति अध्यादेश सहित कई कानून बार-बार अध्यादेश के जरिए बनाए गए हैं। पीठ के सात में से पांच न्यायाधीशों ने अध्यादेश को विधायिका के समक्ष पेश करने के कानून को अनिवार्य बताया, जबकि चीफ जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर और जस्टिस मदन लोकुर ने इसका विरोध किया।
जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, आदर्श कुमार गोयल, उदय उमेश ललित, धनंजय चंद्रचूड और एल नागेर राव ने बहुमत से फैसाला सुनाया। संविधान पीठ ने बहुमत से किए गए फैसले में कहा कि अनुच्छेद 213 और 123 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्रदत्त अधिकार विधायिका की शक्ल के रूप में उन्हें दिए गए हैं। संसद या विधानसभा का सत्र न चलने के कारण यह अधिकार दिए गए हैं। आपात स्थिति के लिए यह अधिकार प्रदान किए गए हैं, लेकिन अध्यादेश को संसद या विधान मंडल में पेश करना अनिवार्य है। यदि संसद के सत्र में इसे पेश नहीं किया गया तो सत्र शुरू होने के छह सप्ताह बाद यह ख़ुद ख़त्म हो जाएगा। अध्यादेश पहले भी निरस्त हो सकता है यदि इसे संसद में पेश किया जाए और सदन इसे अस्वीकार कर दे।
138 पृष्ठ के फैसले में संविधान पीठ ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और राज्यपाल कानून का समानांतर स्रोत नहीं हो सकते। वह एक पृथक विधायिका का रूप नहीं ले सकते। लोकतंत्र में विधायिका का सर्वोच्च स्थान है। अध्यादेश पर विधायिका का नियंत्रण जरूरी है और राष्ट्रपति और राज्यपाल मंत्रीपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। कैबिनेट या मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। विधायिका ही यह तय करने में सक्षम है कि अध्यादेश जरूरी है या नहीं। उसे संशोधन के साथ पारित करने या न करने का अधिकार सिर्फ संसद या विधानसभा को है। विधायिका से बचकर अध्यादेश को बार-बार लागू करना अध्यादेश को अवैध बना देता है.