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'मतभेद हो सकते हैं, मनभेद कभी नहीं', भाजपा और संघ के रिश्तों पर खुलकर बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत

 Published : Aug 28, 2025 06:19 pm IST,  Updated : Aug 28, 2025 11:20 pm IST

भाजपा और संघ के संबंधों पर RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान सामने आया है। मोहन भागवत ने साफ तौर पर कह दिया है कि भाजपा और संघ के बीच मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद कभी नहीं।

संघ-भाजपा के रिश्तों पर मोहन भागवत का बयान।- India TV Hindi
संघ-भाजपा के रिश्तों पर मोहन भागवत का बयान। Image Source : PTI

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा और संघ के रिश्तों को लेकर बड़ा बयान जारी किया है। मोहन भागवत ने कहा है कि बीजेपी और संघ में मतभेद हो सकते हैं, मनभेद कभी नहीं। मोहन भागवत ने ये भी कहा है कि "केंद्र और राज्य की सभी सरकारों के साथ संघ का समन्वय रहता है। किसी विषय पर संघ सलाह दे सकता है लेकिन निर्णय बीजेपी का है। उन्होंने कहा कि हम तय करते तो इतना समय लगता क्या।" माना जा रहा है कि ये बयान उन्होंने भाजपा के अध्यक्ष के चुनाव को लेकर दिया है। आपको बता दें कि बीते कुछ समय से ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि संघ और भाजपा के बीच तनाव चल रहा है।

जब संघ ने की राजीव गांधी की मदद 

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- "जयप्रकाश नारायण 1948 में मशाल लेकर संघ को जलाने चले थे लेकिन इमरजेंसी के बाद आकर बोले कि परिवर्तन की आशा आप लोगों से है। प्रणव मुखर्जी भी हमारे मंच पर आए थे। हमारे संघ के स्वयंसेवक कई दलों के अच्छे काम के लिए भी सहयोग करते हैं। राजीव गांधी जब NSUI के अध्यक्ष थे और उनके नागपुर अधिवेशन में खाने को लेकर हंगामा हो गया और हमसे मदद मांगी गई तो हमने अपने में से मदद कराया।"

BJP अध्यक्ष के चुनाव पर क्या बोले भागवत?

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- "मैं शाखा चलाने में माहिर हूं, भाजपा सरकार चलाने में माहिर है। हम एक-दूसरे को सिर्फ सुझाव दे सकते हैं।" भाजपा के नए अध्यक्ष के फैसले में हो रही देरी पर आरएसएस प्रमुख भागवत ने चुटकी लेते हुए कहा, "आप अपना समय लें, हमें कुछ कहने की जरूरत नहीं है।"

संस्कृत को अनिवार्य बनाने की जरूरत नहीं- भागवत

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शिक्षा के मुद्दे पर भी बात की। उन्होंने कहा- "धार्मिक विश्वास कुछ भी हो सकता है लेकिन शिक्षा की सामाजिक मान्यताएं एक होनी चाहिए और मदरसा हो मिशनरी, सब जगह पढ़ाया जाना चाहिए। अंग्रेजी भी पढ़नी चाहिए। हर भाषा की अपनी लंबी परंपरा है जिसमें अच्छे साहित्य हैं। शिक्षा की मुख्य धारा को गुरुकुल पद्धति की तरफ मोड़ना चाहिए। इसी तरह की पढ़ाई फिनलैंड में होती है जो शिक्षा की व्यवस्था में दुनिया में सबसे अच्छी है और आठवीं तक मातृभाषा में पढ़ाई होती है। संस्कृत का कामचलाऊ ज्ञान भारत को समझने वाले सभी व्यक्ति को होना चाहिए। लेकिन अनिवार्य बनाने की जरूरत नहीं है वरना रिएक्शन होता है।"

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