'धर्म की रक्षा करने से ही सब की रक्षा होती है', RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान
'धर्म की रक्षा करने से ही सब की रक्षा होती है', RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान
Reported By : Yogendra TiwariEdited By : Subhash Kumar
Published : Aug 27, 2025 10:11 pm IST,
Updated : Aug 27, 2025 11:55 pm IST
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि संघ के प्रति अनुकूलता है, समाज की मान्यता है, विरोध बहुत कम हो गया है। जो विरोध है उसकी धार कम हो गई है।
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धर्म को लेकर मोहन भागवत का बड़ा बयान।
दिल्ली में चल रहे आरएसएस के '100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज' पर बोलते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक समरसता का कार्य कठिन होते हुए भी करना ही होगा, उसके अलावा कोई उपाय नहीं है। मोहन भागवत ने अपने आसपास के वंचित वर्ग में मित्रता करने, मंदिर, पानी और श्मशान में कोई भेद न रहे, किसी को कोई रोक ना हो, ऐसी सलाह दी है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता सब बातों की कुंजी है। अपना देश आत्मनिर्भर होना चाहिए। आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी के उपयोग को प्राथमिकता दें।
आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- "देश की नीति में स्वेच्छा से अंतरराष्ट्रीय व्यवहार होना चाहिए, दबाव में नहीं। यह स्वदेशी है, कुटुंब प्रबोधन परिवार में बैठकर सोचे कि अपने भारत के लिए हम क्या कर सकते हैं। अपने देश, समाज के लिए किसी प्रकार से कोई भी कार्य करना, पौधा लगाने से लेकर वंचित वर्ग के बच्चों को पढ़ाने तक का कोई भी छोटा सा कार्य करने से देश और समाज से जुड़ने का मानस बनेगा।"
मोहन भागवत ने कार्यक्रम के दौरान इन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपने विचार रखें-:
संघ के प्रति अनुकूलता है, समाज की मान्यता है, विरोध बहुत कम हो गया है। जो विरोध है उसकी धार कम हो गई है। इसमें संघ की यही सोच है, अनुकूलता मिली है तो सुविधा भोगी नहीं होना है। अनुकूलता मिली है तो आराम नहीं करना है। तो संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने का लक्ष्य प्राप्त करने तक सतत चलते रहना है और चलते रहना है। किस तरीके से तरीका बताया,चार शब्दों में उसका वर्णन हुआ है। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा इस तरह काम चलता है संघ का। इसमें इंसेंटिव नहीं है।
एक हैं यानी सब अपने हैं। हिंदुत्व क्या है? हिंदू की विचारधारा क्या है? सारांश कहना है तो दो शब्द सत्य और प्रेम, दुनिया इस पर चलती है। कॉन्ट्रैक्ट पर नहीं चलती, सौदे पर नहीं चलती।
प्राचीन देश होने के नाते, दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति आये और जीवन की विद्या भारत के लोगों से सीखें। सर्वत्र का भला हो, सब सुखी हो, ऐसे चलना है तो, एक समन्वय स्थापित करना पड़ेगा।
मनुष्य को धर्म को रखना पड़ता है, उसके लिए त्याग रखना पड़ता है। धर्म की रक्षा करने से सब की रक्षा होती है।
दुनिया में कलह दिखता है, कट्टरपन बढ़ गया है। धर्म यानी रिलिजन नहीं, धर्म यह बैलेंस है, धर्म को हमारे यहां कहते हैं मध्यम मार्ग।
आर्थिक उन्नति पर्यावरण के लिए नासक बनती जा रही है। अमीर और गरीब के बीच दूरी बढ़ रही है। इन पर चर्चा बहुत हो रही, उपाय भी बहुत सुझाए जा रहे हैं, परंतु रिजल्ट इज फार अवे।
धर्म में कन्वर्जन होता नहीं है। धर्म एक सत्य तत्व है, जिसके आधार पर सब चलता है, पानी का धर्म है बहना और अग्नि का धर्म है जलना।
आगे का संघ का काम होगा जो हम आज संघ में कर रहे हैं, वह पूरे समाज में हो। देशभक्ति जगाने का काम सारे समाज में। हो नहीं रहा ऐसा नहीं है, अन्य पद्धति से करने वाले लोग हैं।
हमको लगता है कि बहुत खराब हो रहा है, परंतु भारत में जितना बुरा दिखता है, उससे 40 गुना अच्छा है।
बाहर से विचारधारा आई ,आक्रमण के नाते आई। किसी कारण जिन्होंने उसको स्वीकार किया वह तो यहीं के हैं। लेकिन जो दूरियां बनी हैं, दोनों ओर से उसको पाटने के लिए कार्य करने की आवश्यकता है।
सर्वत्र संपर्क होना पड़ेगा, सबसे पहले पड़ोसी देशों में होना पड़ेगा। भारत के अधिकांश पड़ोसी देश पहले कभी भारत ही थे। लोग वही हैं, जोग्राफी वही है, नदियां वही हैं, जंगल वही है, सिर्फ नक्शे पर रेखा खींची गई।
मंदिर, पानी, श्मशान में कोई भेद नहीं होता। इसमें भेद नहीं होना चाहिए। वह सबके लिए है, उसमें भेद नहीं होता। आत्मनिर्भर होना यानी कि सबको बंद करना नहीं होता, इसमें दबाव नहीं होना चाहिए, अपने देश में जो बनता है वह बाहर से लाने की आवश्यकता नहीं है।
अपनी चौखट के अंदर अपनी भाषा होनी चाहिए। अपने घर के चौखट के अंदर अपना व्यवहार करना, यदि अंग्रेजी में हस्ताक्षर करते हो तो बदल दो, अपनी भाषा में हस्ताक्षर करो।
भड़काऊ बात हो गई, कानून हाथ में नहीं लेना है। आत्म संरक्षण का अधिकार सबको है। हाथ में कानून लेकर बात नहीं होनी चाहिए। उपद्रववादी लोग इसका लाभ लेते हैं।