शहरों की चमक-दमक के बीच, जब ग्राहक मोबाइल ऐप पर ऑर्डर प्लेस कर 10 मिनट में डिलीवरी का नोटिफिकेशन देखते हैं, तब सड़कों पर दौड़ते डिलीवरी पार्टनर्स की हकीकत अक्सर नजरों से ओझल रह जाती है। सरकार के हस्तक्षेप के बाद क्विक-कॉमर्स कंपनियों ने भले ही 10 मिनट में डिलीवरी का दावा वापस ले लिया हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे डिलीवरी बॉय यानी गिग वर्कर्स की जिंदगी सच में आसान होगी?
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गिग वर्कर्स का कहना है कि समस्या सिर्फ डिलीवरी टाइम की नहीं, बल्कि कमाई के पूरे मॉडल की है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा रोजाना की डिलीवरी संख्या और इंसेंटिव पर टिका होता है। ऐसे में भले ही 10 मिनट की बाध्यता हट जाए, तेज डिलीवरी और ज्यादा ऑर्डर लेने का दबाव खत्म नहीं होगा। कई डिलीवरी पार्टनर्स बताते हैं कि दिन में 15 घंटे काम करने के बाद भी उनकी कमाई महज 1500-1600 रुपये तक सीमित रहती है।
इंसेंटिव सिस्टम बना सबसे बड़ा दबाव
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम दिल्ली में काम करने वाले 19 वर्षीय डिलीवरी पार्टनर को 1200-1500 रुपये कमाने के लिए 35 से ज्यादा डिलीवरी करनी पड़ती हैं। ज्यादा इंसेंटिव पाने की होड़ में कई बार उन्हें रॉन्ग साइड से बाइक चलानी पड़ती है, जिससे उनकी जान हमेशा जोखिम में रहती है। भले ही कंपनियां कहें कि किसी तय समय में डिलीवरी की मजबूरी नहीं है, लेकिन हकीकत यह है कि इंसेंटिव तभी मिलता है जब एक दिन में तय संख्या में डिलीवरी पूरी हो। 26 साल के एक डिलीवरी पार्टनर के मुताबिक, 440 रुपये का इंसेंटिव पाने के लिए उसे करीब 875 रुपये की बेस कमाई करनी होती है, यानी दिन में लगभग 40 डिलीवरी। यही वजह है कि डिलीवरी की रफ्तार कम होने के बावजूद दबाव बना रहता है।
हड़ताल और नाराजगी
क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर कई शहरों में गिग वर्कर्स ने हड़ताल की थी। उनका कहना था कि न तो न्यूनतम वेतन की गारंटी है और न ही बीमा या सामाजिक सुरक्षा। ऊपर से इंसेंटिव पॉलिसी कभी भी बदल दी जाती है, जिससे उनकी प्लानिंग पूरी तरह बिगड़ जाती है।
कुछ राहत, लेकिन डर भी
बेंगलुरु जैसे शहरों में 10 मिनट डिलीवरी खत्म होने से कुछ डिलीवरी पार्टनर्स को राहत महसूस हो रही है। उनका कहना है कि अब हर ऑर्डर एक दौड़ जैसा नहीं लगेगा। लेकिन मुंबई और लखनऊ जैसे शहरों में कई वर्कर्स को चिंता है कि कहीं ऑर्डर कम न हो जाएं और उनकी आमदनी और न घट जाए।