अमेरिका की ट्रेड पॉलिसी को लेकर जारी सियासी और कानूनी घमासान एक बार फिर सुर्खियों में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ पर टिका सबसे अहम मामला एक बार फिर अधर में लटक गया है। बुधवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी बार इस केस पर फैसला सुनाने से परहेज किया, जिससे न सिर्फ अमेरिका बल्कि दुनिया भर के बाजारों में अनिश्चितता और गहरी हो गई है। खासकर भारत जैसे देशों के लिए यह मामला बेहद अहम है, जिनके निर्यात पर इन टैरिफ्स का सीधा असर पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिर क्यों टाला फैसला?
कोर्ट की परंपरा के मुताबिक, शीर्ष अदालत ने न तो कोई फैसला सुनाया और न ही यह बताया कि अगली सुनवाई या निर्णय की तारीख क्या होगी। इससे पहले 5 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान अदालत के कई कंज़र्वेटिव और लिबरल जजों ने सवाल उठाए थे कि क्या ट्रंप प्रशासन को वाकई इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार था।
IEEPA कानून बना विवाद की जड़
ट्रंप सरकार ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का सहारा लेकर दुनिया भर के देशों पर 10% से 50% तक के आयात शुल्क लगाए थे। यह कानून असाधारण राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए बनाया गया था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ट्रंप ने इसका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा किया। निचली अदालतें पहले ही कह चुकी हैं कि राष्ट्रपति ने अपनी संवैधानिक सीमाएं लांघीं, जिसके खिलाफ प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।
ट्रंप की चेतावनी और सख्त बयान
फैसले से पहले ट्रंप ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी थी कि अगर कोर्ट ने टैरिफ रद्द किए, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अराजकता फैल जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अरबों डॉलर के टैरिफ रिफंड करना पूरी तरह से गड़बड़ होगा। ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर लिखा कि अगर सुप्रीम कोर्ट अमेरिका के खिलाफ गया, तो हम बुरी तरह फंस जाएंगे।
भारत पर सबसे ज्यादा असर
इन टैरिफ्स का असर भारत पर भी साफ दिख रहा है। अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात पर कुल टैरिफ बोझ 50% तक पहुंच चुका है, खासकर रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को लेकर लगाए गए एक्स्ट्रा दंड के बाद। हाल ही में ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भी 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया गया है, जिसमें भारत एक प्रमुख खिलाड़ी है।






































