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Bach Baras Vrat Katha: यहां पढ़ें बछ बारस यानी गोवत्स द्वादशी की पावन कथा

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Oct 17, 2025 07:42 am IST,  Updated : Sep 07, 2026 07:56 am IST

Bach Baras (Govatsa Dwadashi) Vrat Katha:गोवत्स द्वादशी के दिन गायों और बछड़ों की पूजा की जाती है। यहां आप जानेंगे बछ बारस की पावन कथा।

बछ बारस की कथा- India TV Hindi
बछ बारस की कथा Image Source : CANVA

Bach Baras (Govatsa Dwadashi) Vrat Katha: गोवत्स द्वादशी को बछबारस, वसु बारस, वाघ बरस और बछ बारस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन की पूजा गोधूलि बेला में की जाती है। जो लोग गोवत्स द्वादशी व्रत रखते हैं वे दिन में गेहूं और दूध के उत्पादों का सेवन नहीं करते। गोवत्स द्वादशी की पूजा महिलाओं द्वारा पुत्र की मंगल-कामना के लिए की जाती है। चलिए आपको बताते हैं बछ बारस की कथा के बारे में।

Bachh Baras (Govatsa Dwadashi) Vrat Katha - बछ बारस की कथा

बछ बारस की कथा अनुसार एक गांव में भीषण अकाल पड़ गया। उस गांव में एक धर्मात्मा साहूकार रहता था। उसने एक तालाब बनवाया था पर उसमें पानी नही आया था। साहूकार ने विद्वान् पंडितो से पूछा – कि तालाब में पानी नही आने का क्या कारण हैं? इसका कोई उपाय बताइए। तब पंडितो ने कहा कि इसमें एक बालक की बली देनी होगी तब पानी आ जाएगा। साहूकार चिंता में पड़ गया और सोने लगा कि अपना बालक कौन देगा तो साहूकार के दो पोते थे उसने सोचा कि मैं अपने ही एक पोते की बली दे देता हूं इससे गांव में पानी आ जायेगा। परन्तु इस बारे में बहू से कैसे बात करें साहूकार ये सोचने लगा। साहूकार ने बहू को उसके मायके भेज दिया और छोटे पोते को अपने पास रख लिया। बहू पीहर चली गई और पीछे से छोटे पोते की बलि दे दी गई। इसके बाद तालाब लबालब भर गया।

साहूकार ने बड़ा यज्ञ किया। सभी को बुलवाया गया परन्तु उसने बहू को नहीं बुलवाया। जब बहू को पता चला कि उसके ससुराल में यज्ञ हो रहा है तो उसने सोचा कि ज्यादा काम की वजह से शायद ससुराल वाले उसे सूचना देना भूल गए होंगे।बहू ने अपने भाई से कहा कि मुझे मेरे घर छोड़ आइए। बहू ने अपने ससुराल आते ही सास के साथ बछबारस की पूजा की और वह तालाब पर चली गई। साहूकार साहुकरनी मन ही मन बछबारस माता से प्रार्थना करने लगे की हे माता ! हमारी लाज रखना। हम बहू को उसका बेटा कहा से देंगे। तालाब और गाय की पूजा कर तालाब का किनारा खंडित कर बोली 'आवो मेरे बेटो लड्डू उठाओ' सासुजी मन ही मन विनती करती रही। फिर तालाब की मिटटी में लिपटा हुआ बछराज आया हंसराज को भी बुलाया।

पूजा सम्पन्न कर बहू बोली सासुजी ये सब क्या है? तब सासू जी ने बहू को सारी बात बताई और कहा बछबारस माता ने हम सब की लाज रख ली। कहते हैं तभी से बछबारस की पूजा में महिलायें गाय के गोबर से तालाब बनाकर पूजा कर किनारा खण्डित कर उस पर लड्डू रख कर अपने बेटे से उठवाती हैं। हे बछबारस माता जैसे साहूकार साहुकारनी की लाज रखी वैसे ही सबकी रखना।

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