हरतालिका तीज का नाम आते ही भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना, निर्जला व्रत और रातभर होने वाली पूजा की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इस पूजा से जुड़ी एक ऐसी परंपरा भी है, जिसके पीछे खास धार्मिक मान्यता बताई जाती है। यह है पूजा की चौकी के ऊपर लगाया जाने वाला फुलेरा। फूलों, पत्तियों और कई तरह की प्राकृतिक वनस्पतियों से तैयार किया गया यह मंडप देखने में बेहद सुंदर होता है। मान्यता है कि फुलेरा के बिना हरतालिका तीज की पूजा को पूर्ण नहीं माना जाता। आखिर इसे क्यों लगाया जाता है और इसका शिव-पार्वती से क्या संबंध है, आइए जानते हैं।
क्या होता है फुलेरा?
फुलेरा को फूलों और पत्तियों से तैयार किया जाता है। यह एक तरह का प्राकृतिक छत्र या मंडप होता है, जिसे बालू या मिट्टी से बनाए गए पार्थिव शिवलिंग के ठीक ऊपर लगाया जाता है। सनातन धर्म में इसे महादेव और देवी पार्वती के विवाह मंडप और उनकी दिव्य छत्रछाया का प्रतीक माना जाता है।
महादेव की पांच पुत्रियों से जुड़ी मान्यता
फुलेरे से नीचे की तरफ लटकने वाली फूलों की लड़ियों को भगवान शिव की पांच पुत्रियों जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली का प्रतिनिधि माना जाता है। मान्यता है कि फुलेरे के नीचे बैठकर पूजा करने और इसके दर्शन करने से दांपत्य जीवन में चल रहे मतभेद दूर हो सकते हैं। इसके साथ ही विवाहितों को संतान सुख की प्राप्ति की भी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है।
खास फूलों से बनता है
फुलेरा तैयार करने में सामान्य सजावटी फूलों के बजाय प्रकृति में सहज रूप से मिलने वाली कई विशेष वनस्पतियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें चिलबिनिया, नवकंचनी, सागौर, हनुमंत सिंदूरी, धतूरे का फूल, मदार, बिंजोरी, रांग पुष्प और मौसत पुष्प शामिल होते हैं। इसे तैयार करने में करीब 4 से 5 घंटे का समय लग सकता है और इसकी लंबाई लगभग 7 फुट बताई गई है।
पत्तियों का भी महत्व
फुलेरे में नवबेलपत्र, लज्जावती यानी छुईमुई, शिल भिटई, शिवताई, हिमरितुली, चरबेर, झानरपत्ती, त्तिलपत्ती और सात प्रकार की शमी पत्तियों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इन प्राकृतिक फूलों और पत्तियों को माता पार्वती की वन साधना से जोड़कर देखा जाता है।
पार्वती की तपस्या की याद
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वन में कठोर तपस्या की थी। इसी दौरान उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर प्राकृतिक फूलों और वनस्पतियों से उसकी पूजा की थी। फुलेरा को उसी वन पूजा और सादगीपूर्ण साधना का प्रतीक माना जाता है।
पुराणों में भी मिलता है उल्लेख
हरतालिका व्रत की विधि से जुड़े वर्णनों में प्राकृतिक फूलों और पत्तियों से पूजा स्थल सजाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। भविष्योत्तर पुराण और सदियों पुरानी ग्रामीण परंपराओं में भी मिट्टी के विग्रह के ऊपर प्राकृतिक पत्तों और फूलों से मंडप बनाने की परंपरा बताई गई है। यही वजह है कि हरतालिका तीज पर फुलेरा को केवल सजावट नहीं, बल्कि शिव-पार्वती की आराधना और माता पार्वती की तपस्या की स्मृति से जुड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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