देशभर में आज मुहर्रम का 10वां दिन, जिसे 'यौमे-आशूरा' भी कहा जाता है, मनाया जा रहा है। यह दिन इस्लामी इतिहास की एक अत्यंत दर्दनाक घटना 'कर्बला की लड़ाई' की याद दिलाता है। यह वह दिन है जब सच्चाई और न्याय के लिए पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन इब्न अली के साथ उनके 72 वफादार साथी शहीद हो गए, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल थे।
6 महीने और 18 साल के बेटे हुए शहीद
जंग-ए-कर्बला में इमाम हुसैन के 6 महीने के बेटे अली असगर, उनके 18 साल के बेटे अली अकबर, उनके भाई हजरत अब्बास, उनके भतीजे कासिम (सिर्फ 7 साल के थे) के अलावा और भी कई भाई-भतीजे और परिवार के अन्य सदस्य शहीद हुए थे।
महिलाओं-बच्चों को बनाया गया बंदी
इस घटना में इमाम हुसैन के बीमार बेटे हजरत इमाम जैनुल आबिदीन और महिलाएं व बच्चे जिंदा बचे थे, जिनमें उनकी बहन हजरत जैनब बिंते और उनकी बेटी हजरत सकीना भी थीं, जिन्हें बंदी बना लिया गया। इन्हें कूफा और फिर यजीद के दरबार में दमिश्क ले जाया गया।
यजीद की बैअत करने से इंकार
कर्बला की जंग इराक के कर्बला मैदान में इमाम हुसैन इब्न अली और यजीद इब्न मुआविया की सेना के बीच हुई थी। इमाम हुसैन ने उस वक्त के शासक यजीद की गैर-इस्लामी और अत्याचारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई थी। इमाम हुसैन ने यजीद की बैअत (निष्ठा की शपथ) करने से साफ इंकार कर दिया था। यही कर्बला की घटना की मूल वजह थी।
7 मुहर्रम से पानी बंद कर दिया
इराक के कूफा के लोगों ने इमाम हुसैन को खत लिखकर बुलाया था। जब इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ कूफा की ओर बढ़े, तो यजीद की सेना ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया। उमर इब्न साद के नेतृत्व में यजीद की सेना ने इमाम हुसैन और उनके काफिले को फरात नदी से पानी लेने से रोक दिया। कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन, उनके परिवार और साथियों पर पानी 7 मुहर्रम से बंद कर दिया गया था। वे तीन दिनों से प्यासे तड़पते रहे। इस दौरान उनके खेमे में महिलाएं, बच्चे और यहां तक कि 6 महीने का बच्चा अली असगर भी शामिल थे, जो प्यास से बेहाल थे।
यौमे-आशूरा के दिन शहीद हुए इमाम हुसैन
10 मुहर्रम यानी यौमे-आशूरा के दिन, यजीद की सेना ने प्यासे और थके हुए इमाम हुसैन के काफिले पर हमला कर दिया। एक-एक करके सभी को बेरहमी से शहीद कर दिया गया। इस भयानक नरसंहार में इमाम हुसैन के छह माह के बच्चे अली असगर भी शामिल थे, जिन्हें तीर मारकर शहीद कर दिया गया।
अपने परिवार और साथियों के शहीद होने के बाद, इमाम हुसैन ने अकेले ही यजीद की सेना का सामना किया। उन पर तीर, भाले और तलवारों से लगातार हमला किया गया, जिससे वे बुरी तरह घायल हो गए। आखिरकार, शिमर इब्न ज़िल-जौशन ने उनके सिर को उनके धड़ से अलग कर दिया और उसे यजीद के पास दमिश्क भेज दिया। कहा जाता है कि इस क्रूरता से भी उन जालिमों का दिल नहीं भरा और उन्होंने इमाम हुसैन की उंगलियां काट दीं और उनके शरीर पर घोड़े भी दौड़ाए। इसके बाद से इस दिन को अहले बैत से मोहब्बत (पैगंबर मोहम्मद के परिवार से मोहब्बत) और गम-ए-हुसैन के रूप याद कर मनाया जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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