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क्या है 'सुना बेसा' रस्म? जब सोने के गहनों से सजे होते हैं भगवान जगन्नाथ, इस राजा की है अहम भूमिका

 Published : Jul 06, 2025 08:13 am IST,  Updated : Jul 06, 2025 08:13 am IST

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा समाप्त हो चुकी है और वे अपने मंदिर में लौट चुके हैं। आज भगवान की 'सुना बेसा' रस्म होने जा रही है।

भगवान जगन्नाथ- India TV Hindi
आभूषणों से सजे भगवान जगन्नाथ Image Source : INDIA TV

बीते दिन भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा यात्रा संपन्न हो गई, अब आज भगवान की 'सुना बेसा' रस्म होने जा रही है। सुना बेसा, जिसे राजा बेसा या बेसा भी कहा जाता है, रथ यात्रा के दौरान होने वाला एक बहुत शुभ अवसर है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को खूबसूरती से तराशे गए सोने के गहनों से सजाया जाता है। पूरे शरीर पर ऊपर से नीचे तक सोने की चमक और कीमती पत्थरों से अलंकृत ये रूप भक्तों के लिए दिव्य दर्शन का अवसर होता है।

रथ पर ही सजते हैं भगवान

यह रस्म गुंडिचा मंदिर से भगवानों की वापसी के अगले दिन, आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि होती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अनन्य वेशों में से सुना बेसा सबसे लोकप्रिय और अद्भुत माना जाता है क्योंकि यह भव्य रथों पर किया जाता है। इसे 'बड़ा तधौ बेसा' भी कहा जाता है। भगवानों के रथों पर ही उनके हाथ, बाजू और मुकुट सोने से सजाए जाते हैं।

साल में पांच बार मनाया जाता है

'सुना बेसा' रस्म साल में पांच बार मनाई जाती है, आइए जानते हैं कब-कब-

  1. विजया दशमी के दिन
  2. कार्तिक पूर्णिमा के दिन
  3. पौष पूर्णिमा के दिन
  4. माघ पूर्णिमा के दिन
  5. आषाढ़ एकादशी के दिन

'सुना बेसा' रस्म क्या है?

‘सुना बेसा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘सुना’ यानी सोना और ‘बेशा’ यानी वेशभूषा। रथ यात्रा के दौरान बाहुड़ा एकादशी के दिन सुनाबेशा कार्यक्रम रथों पर सिंहद्वार के सामने मनाया जाता है। बाकी चार सुना बेसा मंदिर के भीतर रत्नसिंहासन पर मनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के दाहिने हाथ में सोने से बना चक्र और बाएं हाथ में चांदी की शंख होती है। वहीं भगवान बलभद्र के बाएं हाथ में सोने का हल और दाहिने में सोने का गदा सजाया जाता है।

राजा कपिलेंद्रदेव के समय से हुई शुरू रस्म

इतिहास में 'सुना बेसा' की शुरुआत सन् 1460 ईस्वी में राजा कपिलेंद्रदेव के समय में हुई थी। जब राजा ने दक्षिण भारत के राजाओं पर विजय प्राप्त की थी, तो वे 16 बैलगाड़ियों में भरकर सोना और हीरे जीतकर लाए थे। जब वे पुरी पहुंचे, तो उन्होंने सारा खजाना भगवान जगन्नाथ को दान कर दिया और पुजारियों से कहा कि इनसे भगवानों के लिए आभूषण तैयार किए जाएं और रथ यात्रा के समय उन्हें पहनाया जाए। तभी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को बाहुड़ा यात्रा के बाद इन गहनों से सजाया जाता है।

ये गहने मंदिर के खजाने, या 'भीतर भंडार घर' में सुरक्षित रखे जाते हैं। भंडार पुजारी इन गहनों को सशस्त्र पुलिस और मंदिर के अधिकारियों की निगरानी में  कार्यक्रम से एक घंटा पहले निकालते हैं और उन्हें पुष्पलक तथा दैतापति पुजारियों को सौंपते हैं। दैतापति पुजारी ही भगवानों को सोने के गहनों से सजाते हैं।

क्या-क्या है आभूषण में?

सुनाबेशा के दौरान भगवानों को कई आभूषणों से सजाया जाता है जिनमें सुन हस्त (सोने का हाथ), सुन पायर (सोने के पैर), सुन मुकुट(सोने का मुकुट), सुन मयूर चंद्रिका(सोने का मोर पंख), सुन चुलापाटी(माथे का गोल सोने का गहना), सुन कुंडल(झूलते हुए गोल सोने के कुंडल), सुन माला(अलग-अलग डिज़ाइन की सोने की मालाएँ),पद्म माला(कमल के आकार की),सुन चक्र(सोने का चक्र) , सुन गदा(सोने की गदा), सुन पद्म(सोने का कमल) , रूपा शंख(चांदी की शंख) शामिल हैं।

ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त भगवान के इस 'सुना बेसा' रूप का दर्शन करता है, उसके सारे पाप मिट जाते हैं। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए मंदिर के सामने एकत्र होते हैं और उनकी भव्यता का अनुभव करते हैं।

ओडिशा से शुभम कुमार की रिपोर्ट

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