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हरछठ यानी ललही छठ की व्रत कथा: व्रती स्त्रियों को झूठ बोलकर गाय का दूध बेचने वाली ग्वालिन की कथा

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Sep 01, 2026 08:37 am IST,  Updated : Sep 01, 2026 08:37 am IST

हरछठ (ललही छठ) का पावन पर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं अपनी संतानों के सुखी जीवन के लिए व्रत रखती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस व्रत में कौन सी कथा पढ़ना अनिवार्य माना जाता है? चलिए इस बारे में जानते हैं यहां।

harchhath katha- India TV Hindi
हरछठ व्रत कथा Image Source : INDIA TV

हरछठ को हल षष्ठी और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस साल हर छठ का त्योहार 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाया जा रहा है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन श्री बलराम जी का जन्म हुआ था। कहते हैं इस दिन जो भी महिलाएं व्रत रहती हैं उन्हें खेत में उगे या हल से जोते गए किसी भी अनाज का सेवन नहीं करना चाहिए। पूजा के बाद महिलाओं को केवल तालाब में पैदा हुए तिन्नी के चावल, केर्मुआ का साग और पसही के चावल का ही सेवन करना चाहिए। बता दें इस शुभ अवसर पर मुख्य रूप से भगवान बलराम, छठ माता और शीतला माता की पूजा की जाती है। चलिए अब जानते हैं हरछठ की व्रत कथा।

हर छठ (ललही छठ) व्रत कथा

हरछठ की कथा अनुसार, प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जो दूध, दही आदि चीजें बेचकर अपना जीवन-यापन करती थी। एक समय वह गर्भवती हुयी और उसका प्रसवकाल नजदीक ही था। लेकिन फिर भी वह दूध-दही बेचने में लगी रही। उसे एक दिन अत्यन्त तेज प्रसव-पीड़ा होने लगी। लेकिन उसे घर में रखे दूध, दही, मक्खन आदि को बेचने की चिंता लगी हुई थी। ग्वालिन ने सोचा कि यदि उसके बच्चे का जन्म हो गया, तो उसकी यह सामग्री बिक नहीं पायेगी। यही विचार करके वह अपने सिर पर दही और मक्खन की मटकी रखकर निकल पड़ी। मार्ग में चलते-चलते उसे और भी ज्यादा पीड़ा होने लगी। पास में ही उसे झरबेरी की कुछ झाड़ियां दिखाई दीं। वह उन्हीं झाड़ियों की ओट में बैठ गयी और उसी स्थान पर उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया।

दूध-दही बेचने के लालच में उस ग्वालिन ने अपने शिशु को एक कपड़े में लपेटकर उसी स्थान पर लिटा दिया और वह दूध-दही बेचने के लिए चली गई। उस दिन हलछठ का व्रत था और जिस गांव में वह दूध-दही बेचने गई थी वहां लगभग सभी महिलाओं ने व्रत रखा हुआ था। हलछठ के व्रत में गाय के दूध, दही आदि का सेवन नहीं किया जाता है, इस दिन व्रती सिर्फ भैस के दूध-दही का सेवन करती हैं। लेकिन ग्वालिन के पास जो दूध, दही, मक्खन था उसमें भैंस और गाय दोनों का दूध मिश्रित था, किन्तु उसने सभी से झूठ कहा कि उसके पास सिर्फ भैस के दूध से बनी चीजे हैं। इसलिये उसका सम्पूर्ण दूध-दही शीघ्र ही बिक गया। यह देख ग्वालिन बहुत प्रसन्न हुई।

उधर जहां ग्वालिन अपने बच्चे को छोड़कर आई थी, वहीं एक किसान हल चला रहा था। अचानक से उस किसान के बैल अनियन्त्रित हो गये और वे भागते हुये खेत की मेड़ पर चढ़ गये। वे बैल इधर-उधर भाग ही रहे थे कि तभी उनसे बंधा हुआ हल उस ग्वालिन के शिशु से जा टकराया। जिससे उसका पेट फट गया। किसान को जैसे ही शिशु के रोने की आवाज आई, वह दौड़ा-दौड़ा झाड़ियों के पास गया। वहां शिशु को घायल देख किसान घबरा गया। किसान को समझ नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे। असमंजस की स्थिति में किसान ने झरबेरी के कांटों से ही उस शिशु के पेट में टांके लगा दिये और उसे वहीं छोड़कर चला गया।

जब ग्वालिन वहां पहुंची, तो उसने देखा कि उसका शिशु मृत पड़ा हुआ है और अपने बालक की ऐसी स्थिति देख ग्वालिन का हृदय कांप उठा। ग्वालिन मन ही मन यह विचार करने लगी कि "यह सब मेरे ही पाप के कारण हुआ है। अगर मैं हलछठ का व्रत रखने वाली महिलाओं के साथ धोखा नहीं करती तो मेरे साथ ऐसा नहीं होता।" बहुत विलाप करने के बाद उसने निर्णय लिया कि - "मुझे पुनः उन सभी स्त्रियों के समक्ष जाकर अपनी गलती का प्रायश्चित्त करना चाहिये।" ऐसा विचार कर वह ग्वालिन उसी गांव में पहुंची जहां उसने झूठ बोलकर गाय का दूध बेचा था। विलाप करते हुए ग्वालिन प्रत्येक गली-मोहल्ले में भ्रमण करते हुये चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगी कि - "मैंने जो दूध, दही, मक्खन आदि बेचा था, वह गाय और भैंस दोनों का था, मैंने झूठ कहा था कि वह केवल भैंस का ही है, मुझे क्षमा करें, मेरे कारण आप लोगों का व्रत भंग हुआ है, मुझे क्षमा करें। भगवान ने दण्डस्वरूप मेरी सन्तान को मुझसे छीन लिया। मैं बहुत लज्जित हूं, कृपा करके मुझे क्षमा करें।"

उस ग्वालिन का दुख सुनकर व्रती स्त्रियों ने उसे क्षमादान देते हुये आशीर्वाद प्रदान किया। उन सभी से क्षमा-याचना मांगने के बाद ग्वालिन फिर से उसी झरबेरी की झाड़ी के पास गई जहां उसका मृत शिशु पड़ा था। किन्तु उसने देखा कि उसका पुत्र जीवित और सकुशल है। उस दिन से उस ग्वालिन ने अपने जीवन में कभी झूठ न बोलने का प्रण लिया और वह भक्तिपूर्वक हलछठ का व्रत करने लगी। इस प्रकार हल षष्ठी की अत्यन्त लोकप्रिय कथा सम्पूर्ण होती है।

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