इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा कि शादी के 7 साल के अंदर किसी विवाहित महिला की ससुराल में उसकी असामान्य हालातों में मौत होना और मौत से ठीक पहले दहेज की डिमांड को लेकर क्रूरता या उत्पीड़न के साबित होने के केस में दहेज हत्या की कानूनी धारणा बनती है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे केस में पति या ससुराल वालों का महिला की मौत से सीधा कनेक्शन साबित करने वाला प्रत्यक्ष सबूत होना जरूरी नहीं है।
उम्रकैद की सजा 10 साल के कारावास में बदली
बेंच ने यह टिप्पणी दहेज हत्या के एक केस में पति संदीप सिंह होरा की उम्रकैद की सजा को कम करके 10 साल के कठोर कारावास में बदलते हुए की। तालकटोरा थाना इलाके में साल 2010 में हुई इस घटना के मामले में लोअर कोर्ट ने साल 2018 में होरा को उम्रकैद की सजा दी थी। होरा ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी।
असामान्य परिस्थितियों में हुई थी पत्नी की मौत
जस्टिस अब्दुल मुईन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने दहेज हत्या के लिए आईपीसी की धारा 304-बी के तहत उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी लेकिन केस के तथ्यों को देखते हुए उम्रकैद की अधिकतम सजा को उचित नहीं माना। बेंच ने कहा कि महिला की ससुराल में असामान्य हालातों में मौत हुई थी और केस के दौरान दहेज की मांग को लेकर उसके साथ क्रूरता किए जाने की बात साबित हुई।
लोअर कोर्ट ने अधिकतम सजा देने के लिए कारण नहीं बताया
बेंच ने कहा कि धारा 304-B की जरूरी शर्तें पूरी होने पर कानून दहेज हत्या का केस बनता है और ऐसे में आरोपी का महिला की मौत से सीधा संबंध दर्शाने वाला प्रत्यक्ष सबूत नहीं होने मात्र से दहेज हत्या का अपराध खत्म नहीं हो जाता। हालांकि, हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि लोअर कोर्ट ने अधिकतम सजा देने के लिए कोई ठोस कारण नहीं बताया।
होरा पहले ही काट चुका है 6 साल की सजा
पीठ ने कहा कि सजा तय करते वक्त गंभीर और राहत देने वाली परिस्थितियों के बीच उचित संतुलन नहीं बनाया गया। मौजूदा मामला ऐसा दुर्लभ केस नहीं है, जिसमें उम्रकैद जैसी अधिकतम सजा दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि होरा 6 साल 4 महीने 19 दिन की वास्तविक सजा भुगत चुका है।
दुर्लभ केस में ही दी जा सकती है उम्रकैद की सजा
बेंच ने कहा कि इस अवधि में उसके आचरण या पूर्व आपराधिक इतिहास के संबंध में कोई प्रतिकूल रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने पेश नहीं की गई। होरा की उम्र लगभग 40 साल है और घटना को 16 साल बीत चुके हैं। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 304-B में उम्रकैद का प्रावधान होने के बावजूद ऐसी अधिकतम सजा दुर्लभ केस में ही दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजाएं रखीं बरकरार
हाईकोर्ट बेंच ने इसी आधार पर होरा की उम्रकैद की सजा को 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया और जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित करने का भी ऑर्डर दिया। पीठ ने हालांकि IPC की धारा 498-ए और 406 व दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं तीन और चार के तहत उसकी दोषसिद्धि और सजाएं बरकरार रखीं। इससे पहले, एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि पति की सैलरी का 25 फीसदी गुजारा भत्ता देना अनिवार्य नहीं है।
(इनपुट- भाषा)
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