चित्रकूट: यूपी के एक IAS अधिकारी ने पैरेंट्स के लिए एक मिसाल पेश की है और अपनी बेटी का एडमिशन आंगनबाड़ी केंद्र में करवाया है। आज के दौर में जब माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए महंगे और प्राइवेट स्कूलों का चयन कर रहे हैं, तब चित्रकूट जिले के जिलाधिकारी (DM) पुलकित गर्ग ने अपनी बेटी का एडमिशन आंगनबाड़ी केंद्र में करवाया है।
Related Stories
कहां करवाया एडमिशन?
चित्रकूट के डीएम पुलकित गर्ग ने अपनी बेटी सिया का एडमिशन धनुष चौराहा स्थित कंपोजिट विद्यालय परिसर में संचालित आंगनबाड़ी केंद्र में करवाया है। उन्होंने अपने इस कदम से समाज को ये मैसेज देने की कोशिश की है कि जिलाधिकारी की बेटी भी आंगनबाड़ी स्कूल में पढ़ सकती है और सरकारी स्कूल भी बेहतर शिक्षा दे सकते हैं।
वैसे तो अपने बच्चों को कहां पढ़ाना है, ये माता-पिता का एक निजी फैसला होता है। लेकिन कई बार देखा गया है कि सीमित आय वाले माता-पिता अपने खर्चों में कटौती करके बच्चों को महंगे और फैंसी स्कूलों में पढ़ाने के लिए मजबूर हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकारी स्कूल में अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी। ऐसे में डीएम ने अपनी बेटी का एडमिशन आंगनबाड़ी स्कूल में करवाकर ये मैसेज दिया है कि डीएम की बेटी आंगनबाड़ी में पढ़ सकती है तो आम आदमी भी वहां बेफिक्र होकर अपने बच्चों का एडमिशन करवा सकता है। यानी आंगनबाड़ी में भी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी।
डीएम पुलकित गर्ग ने क्या बताया?
बेटी का एडमिशन आंगनबाड़ी केंद्र में करवाकर डीएम पुलकित गर्ग ने ये स्पष्ट कर दिया कि सरकारी स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र किसी भी मायने में कमतर नहीं हैं। डीएम पुलकित गर्ग ने कहा कि आंगनबाड़ी केंद्रों में छोटे बच्चों के लिए शिक्षा, खेल, पोषण और देखभाल की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है। उन्होंने आम जनता, कर्मचारियों और अभिभावकों से अपील की कि वे दिखावे की दौड़ से बाहर निकलकर सरकार की योजनाओं पर भरोसा करें और अपने बच्चों का नामांकन सरकारी विद्यालयों व आंगनबाड़ी केंद्रों में कराएं।
आंगनबाड़ी टीचर ने क्या बताया?
आंगनबाड़ी टीचर ने बताया कि जब जिले का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं अपने बच्चे को आंगनबाड़ी में पढ़ाने का निर्णय लेता है, तो यह सरकारी योजनाओं पर भरोसे की सबसे बड़ी गारंटी बन जाता है। इस कदम से न केवल आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है, बल्कि आम लोगों के बीच भी सरकारी व्यवस्थाओं के प्रति विश्वास मजबूत हुआ है।
अब फैसला जनता को लेना है कि क्या वो भी सरकारी योजनाओं पर विश्वास करके अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएंगे या फिर महंगे स्कूलों में ही अपने बच्चों का एडमिशन करवाएंगे। (इनपुट: चित्रकूट से अशोक द्विवेदी)