मौसम विभाग की भविष्यवाणियों के दौर में कानपुर का एक प्राचीन मंदिर आज भी अपने अनोखे रहस्य के कारण चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कानपुर के घाटमपुर तहसील के बेहटा बुजुर्ग गांव में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर सदियों से मानसून की आहट बताने के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मंदिर के गुम्बद में लगा एक विशेष पत्थर बारिश आने से पहले पानी की बूंदें छोड़ने लगता है और इन्हीं बूंदों के आधार पर वर्षा की तीव्रता का अनुमान लगाया जाता है। इस बार भी मानसून की प्रतीक्षा के बीच किसानों और ग्रामीणों की नजरें मंदिर के उसी रहस्यमयी पत्थर पर टिकी हुई हैं। हालांकि मंदिर से मिले ताजा संकेतों के अनुसार फिलहाल अच्छी बारिश की संभावना नजर नहीं आ रही है, जो किसानों के लिए चिंता का विषय है।
गुम्बद में दिखीं बूंदें, लेकिन नहीं टपका पानी
कानपुर शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और किसानों की संख्या इन दिनों बढ़ गई है। मंदिर के पुजारी कुड़हा प्रसाद शुक्ला बताते हैं कि इस बार गुम्बद में लगा पत्थर पूरी तरह से नहीं भीगा है। पत्थर के केवल कुछ हिस्सों पर हल्की नमी और छोटी-छोटी बूंदें दिखाई दी हैं, लेकिन वे नीचे नहीं टपकी हैं। उनके अनुसार मंदिर की परंपरागत मान्यता कहती है कि जब पत्थर से लगातार बूंदें टपकने लगती हैं और वे भगवान जगन्नाथ के विग्रह तक पहुंचती हैं, तब अगले कुछ दिनों में तेज और व्यापक वर्षा होती है। अभी बूंदों का आकार छोटा है और उनकी संख्या भी कम है इसलिए यह केवल हल्की बारिश या आंधी के संकेत माने जा रहे हैं।
किसान मानते हैं प्राकृतिक मौसम केंद्र
ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक तकनीक आने के बाद भी मंदिर की यह परंपरा लोगों का विश्वास बनाए हुए है। कई स्थानीय निवासी बताते हैं कि वर्षों से देखा गया है कि पत्थर से जितनी अधिक बूंदें गिरती हैं, उतनी ही अधिक बारिश होती है। खास बात यह है कि जब वर्षा शुरू हो जाती है तो पत्थर से बूंदों का निकलना बंद हो जाता हैं। वहीं यहां गांव में रहने वाले ग्रामीणों का कहना है कि पत्थर पर बूंदों का दिखाई देना मानसून की दस्तक का संकेत जरूर है, लेकिन यदि अगले कुछ दिनों में बूंदों की मात्रा नहीं बढ़ती तो मानसून कमजोर भी रह सकता है। यही कारण है कि आसपास के कई गांवों के किसान खेती की तैयारी से पहले मंदिर के संकेतों को गंभीरता से देखते हैं।
इतिहास और रहस्य से घिरा है मानसून मंदिर
भगवान जगन्नाथ मंदिर की पहचान केवल मानसून की भविष्यवाणी तक सीमित नहीं है। इसके निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों में आज भी मतभेद हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच निर्मित मानते हैं, जबकि स्थानीय मान्यताओं और मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन अवशेषों के आधार पर कई लोग इसकी आयु चार हजार वर्ष से भी अधिक बताते हैं। मंदिर की दीवारों, पत्थरों और चौखटों पर उकेरी गई कलाकृतियां इसके प्राचीन वैभव की गवाही देती हैं। कुछ इतिहासकार मंदिर पर बने मोर और चक्र के चिह्नों को देखकर इसे सम्राट हर्षवर्धन काल से भी जोड़ते हैं। हालांकि अब तक कोई सर्वमान्य निष्कर्ष सामने नहीं आ सका है।
वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए रहस्य
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता उसका ‘मानसून पत्थर’ है। वर्षों से वैज्ञानिक और शोधकर्ता यह जानने का प्रयास करते रहे हैं कि आखिर यह पत्थर मौसम बदलने से पहले नमी कैसे छोड़ने लगता है। कई बार सर्वेक्षण और अध्ययन किए गए, लेकिन आज तक इस रहस्य का कोई ठोस वैज्ञानिक जवाब नहीं मिल सका। विशेषज्ञ केवल इतना स्पष्ट कर पाए हैं कि मंदिर का अंतिम बड़ा जीर्णोद्धार लगभग 11वीं शताब्दी में हुआ था। इसके पहले मंदिर का निर्माण कब और किसने कराया, यह अब भी रहस्य बना हुआ है।
उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से अलग पहचान
बेहटा बुजुर्ग का यह मंदिर स्थापत्य और धार्मिक परंपराओं के लिहाज से भी विशिष्ट माना जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ के साथ बलराम की प्रतिमा तो है, लेकिन उड़ीसा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की तरह माता सुभद्रा की प्रतिमा नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए दशावतार और अन्य शिल्पकृतियां इसे अलग पहचान देती हैं। करीब 14 इंच मोटी दीवारों वाला यह मंदिर बाहर से बौद्ध स्तूप जैसा दिखाई देता है। इसके परिसर में एक प्राचीन कुआं और तालाब भी मौजूद है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ाते हैं।
यहां भी रथयात्रा में उमड़ता है जनसैलाब
हर वर्ष यहां भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा भी निकाली जाती है। गांव की गलियों से होकर गुजरने वाली इस यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। आगामी दिनों में होने वाली रथयात्रा की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। फिलहाल मानसून के इंतजार में किसानों की निगाहें फिर उसी रहस्यमयी पत्थर पर टिकी हैं। मंदिर के संकेत बताते हैं कि बारिश की दस्तक तो करीब है, लेकिन झमाझम बरसात के लिए अभी कुछ और इंतजार करना पड़ सकता है। मौसम विभाग की भविष्यवाणियों के बीच यह प्राचीन मंदिर आज भी ग्रामीणों के लिए भरोसे का एक अनोखा केंद्र बना हुआ है।
(रिपोर्ट - अनुराग श्रीवास्तव)
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