जब YRF ने घोषणा की कि वे एक फीमेल-लीड स्पाई थ्रिलर फिल्म बना रहे हैं तो इंटरनेट पर सभी ने कई तरह की अटकलें लगाना शुरू कर दी। इसमें कौन कास्ट होगा? क्या यह स्पाई यूनिवर्स का हिस्सा होगी? जल्द ही यह रहस्य सुलझ गया। आलिया भट्ट और शरवरी 'अल्फा' की टीम में शामिल हो गईं और उस फ्रैंचाइजी का हिस्सा बनीं, जिसमें पहले से ही सलमान खान की 'टाइगर', शाहरुख खान की 'पठान' और ऋतिक रोशन की 'वॉर' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में अपनी जगह बना चुकी हैं।
रिलीज की तारीख में कुछ बदलावों के बाद 'अल्फा' आखिरकार सिनेमाघरों में आ गई है। उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं तो क्या आलिया और शरवरी इस जबरदस्त मिशन को पूरा कर पाती हैं? या 'अल्फा' अपने लक्ष्य से चूक जाती है? आइए जानते हैं।
'अल्फा' की कहानी
कहानी बॉबी देओल के किरदार फतेह सिंह लखावत से शुरू होती है, जो सीता को अगवा कर उसे एक बेरहम सैनिक के तौर पर तैयार करता है। जिस आदमी को वह 'बाबा' कहती है। उसके लिए वह बस एक 'लैब रैट' है, जिसका इस्तेमाल वह एक एक्सपेरिमेंटल 'अल्फा' ड्रग को टेस्ट करने के लिए करता है।
यह ड्रग घाव भरने की रफ्तार बढ़ाने और इंसानी इंस्टिंक्ट्स को तेज करने के लिए बनाया गया है, जिससे यह सैनिकों के लिए एक जबरदस्त हथियार बन जाता है। उसकी देखरेख में सीता भावनाओं से दूर एक निडर 'किलिंग मशीन' बन जाती है, जिसे सिर्फ एक ही मकसद के लिए तैयार किया जाता है।
यहीं पर शरवरी की एंट्री होती है। दुर्गा का किरदार निभाते हुए, वह सीता से बात करने और उसे शांत करने की कोशिश करती है। कई घटनाओं के बाद दोनों को लखावत की जिंदगी से जुड़ा एक राज पता चलता है। क्या वे उसे हराने में कामयाब हो पाती हैं, यही 'अल्फा' की कहानी का मुख्य हिस्सा है।
'अल्फा' में कास्ट की परफॉर्मेंस
यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि फिल्म में आलिया भट्ट का रोल सबसे अहम है। वह फिल्म की मुख्य 'अल्फा' हैं और सही भी है। आलिया एक बेहतरीन कलाकार हैं। वह जानती हैं कि किसी रोल में खुद को कैसे ढालना है, लेकिन 'अल्फा' में शुरुआत में कुछ अजीब लगता है। उनके खतरनाक और बुरे दिखने की कोशिश के साथ तालमेल बिठाने में आपको थोड़ा समय लगेगा। असल में वह वैसी दिखती नहीं हैं। हालांकि, आखिर तक वह आपको पसंद आने लगती हैं। एक एक्शन स्टार के तौर पर उनकी मौजूदगी की आपको आदत हो जाएगी। इसके बावजूद, सीता के रोल में आलिया ने कोशिश की है। उनकी परफॉर्मेंस बुरी भी नहीं है, लेकिन फिर भी कुछ कमी महसूस होती है तो क्या हम चाहेंगे कि वह आगे सिर्फ एक्शन-ओरिएंटेड रोल ही करें? शायद नहीं।
'अल्फा' में शरवरी दूसरी लीड एक्ट्रेस हैं और अफसोस की बात है कि फिल्म में उनके साथ वैसा ही बर्ताव किया गया है। उन्हें आलिया भट्ट के मुकाबले बहुत कम स्क्रीन टाइम मिला है। फिर भी वह हर सीन में अपनी छाप छोड़ती हैं। दुर्गा के रोल में वह दमदार और असरदार लगती हैं, खासकर एक्शन सीन में चमकती है। उन्होंने अपना काम बखूबी किया है। बस काश फिल्म में उन्हें और ज्यादा काम करने को मिला होता।
बॉबी देओल 'अल्फा' की सबसे बड़ी खूबियों में से एक हैं। फतेह सिंह लखावत के रोल में वह बेदर्द, बेरहम और सचमुच डरावने लगते हैं। जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं तो सबका ध्यान खींच लेते हैं। साफ है कि बॉबी को नेगेटिव रोल में अपनी असली पहचान मिल गई है और यह उनके लिए बहुत बढ़िया काम कर रहा है।
अनिल कपूर का काम बहुत सहज है। RAW चीफ विक्रांत कौल के रोल में वह फिल्म में परिपक्वता और इमोशनल गहराई लाते हैं। एक पिता के तौर पर उनका दर्द महसूस होता है और उनकी परफॉर्मेंस में कहीं कोई कमी नहीं दिखती। बरसों के अनुभव का यही तो कमाल है।
दिव्येंदु भट्टाचार्य, जिन्होंने 'अल्फा' ड्रग बनाने वाले साइंटिस्ट का रोल किया है। उन्होंने कम स्क्रीन टाइम मिलने के बावजूद बेहतरीन काम किया है। वह तुरंत अपनी छाप छोड़ जाते हैं। काश मेकर्स ने उनके जैसे काबिल एक्टर के लिए और भी दमदार रोल लिखा होता।
स्पॉइलर अलर्ट
हमने सबसे बेहतरीन चीज आखिर के लिए बचाकर रखी थी। ऋतिक रोशन 'वॉर' वाले कबीर के रोल में वापसी करते हैं और उनके आते ही थिएटर में जान आ जाती है। वह पंच और किक मारते हैं और 'अल्फा' गर्ल्स के मिशन में शामिल हो जाते हैं। उनकी एंट्री, एक्शन सीन और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में से हैं।
'अल्फा' का म्यूजिक और डायलॉग
ध्यान दें वाली बात यह है कि 'अल्फा' को असल में म्यूजिक ने ही संभाला है, जब भी आलिया और शरवरी बंदूक उठाती हैं तो बजने वाला जोरदार म्यूजिक फिल्म के एक्शन सीन्स में गंभीरता लाता है। हम जानते हैं कि हर फिल्म में खासकर एक्शन फिल्मों में साउंड कितना अहम होता है, लेकिन 'अल्फा' में म्यूजिक का असर कुछ ज्यादा ही साफ देखने को मिलेगा।
'अल्फा' में डायलॉग बहुत ज्यादा नहीं हैं। बीच-बीच में बस कुछ डायलॉग आते हैं। फिल्म एक्शन को ही अपनी बात कहने देती है और कहीं न कहीं, इसी वजह से 'अल्फा' बनावटी नहीं लगती और थोड़ी असली-सी लगती है।
'अल्फा' का डायरेक्शन
शिव रवैल, जिन्होंने YRF की 'द रेलवे मेन' से डायरेक्शन में डेब्यू किया था। उन्होंने 'अल्फा' के साथ एक्शन जॉनर में कदम रखा है और उन्हें साफ तौर पर पता है कि एक्शन फिल्म कैसे बनती है। उन्हें पता है कि हीरो जैसा दिखाने वाला 'लो-एंगल शॉट' कब लगाना है, लड़ाई के दौरान कब 'शेकी कैमरा' का इस्तेमाल करना है और इंटेंसिटी बढ़ाने के लिए 'क्लोज-अप' का इस्तेमाल कैसे करना है। ये विजुअल चॉइस अक्सर फिल्म को संभाल लेती हैं और फिल्म की औसत स्क्रीनप्ले की कमी को लगभग पूरा कर देती हैं।
सच कहें तो बॉलीवुड में महिला-प्रधान एक्शन फिल्म रिलीज करना आसान नहीं है, खासकर ऐसे इंडस्ट्री में जहां लंबे समय से एक्शन फिल्मों में पुरुष स्टार्स का दबदबा रहा है। हो सकता है कि 'अल्फा' में सब कुछ एकदम सही न हो, लेकिन यह निश्चित रूप से सही दिशा में उठाया गया एक कदम लगता है और यह मानने के लिए काफी है कि शिव रवैल में बहुत क्षमता है।
'अल्फा' में क्या काम करता है और क्या नहीं
'अल्फा' तब अच्छा काम करती है, जब वह चीजों को बेवजह मुश्किल बनाने के बजाय अपने एक्शन पर ध्यान देती है। स्टंट स्टाइलिश हैं, फिल्म का स्केल बहुत बड़ा है और प्रोडक्शन वैल्यू YRF वाली है। लीड एक्ट्रेस ने अपनी फिटनेस पर काफी मेहनत की है। आलिया भट्ट ने एक्शन ठीक-ठाक किया है, शरवरी ने अच्छा किया, बॉबी देओल का विलेन वाला रोल जबरदस्त है और कबीर के तौर पर ऋतिक रोशन की एंट्री? पैसा वसूल। जैसे ही वह स्क्रीन पर आते हैं फिल्म में अचानक जान आ जाती है।
लेकिन फिर स्क्रीनप्ले आपको याद दिलाता है कि आप यहां क्यों हैं।
दो बहनों पर बनी इस फिल्म में हैरानी की बात है कि इमोशनल गहराई बहुत कम है। कहानी आपसे उम्मीद करती है कि आप भावनाएं महसूस करें, जबकि इसके लिए काफी वजहें नहीं देती। 'अल्फा' ड्रग, जो फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट हो सकता था। उतना रोमांचक नहीं बन पाया जितना सुनने में लगता है। शरवरी को सिर्फ "दूसरी लीड" तक सीमित रखने के बजाय उन्हें और बेहतर रोल मिलना चाहिए था और कुछ ट्विस्ट इतने आसान हैं कि आप उन्हें पहले ही भांप लेते हैं।
फिल्म में सभी सही चीजें हैं। बस उन्हें ठीक से दिखाना भूल गए है।
'अल्फा' कैसी है?
'अल्फा' उन फिल्मों में से एक है, जिनके लिए आप दिल से चाहते हैं कि वे हिट हों। यह बॉलीवुड की पहली महिला-प्रधान स्पाई फिल्म है। इसमें आलिया भट्ट, शरवरी, बॉबी देओल, अनिल कपूर और एक सरप्राइज है, जिसके बारे में फैंस थिएटर से निकलने के बाद भी काफी समय तक बात करेंगे। कागज पर तो यह एक जबरदस्त हिट फिल्म होनी चाहिए थी। इसके बजाय यह बस ठीक-ठाक फिल्म बनकर रह जाती है। यह बिग बजट लगती है। एक्शन शानदार है। परफॉर्मेंस शानदार हैं, लेकिन धमाकों, इमोशनल सीन्स और यूनिवर्स बनाने के बीच यह हमें ऐसी कहानी देना भूल जाती है जो सच में हमारे दिल में बस जाए। जैसा कि हमने शुरू में कहा था। कुछ मिशन नामुमकिन होते हैं। 'अल्फा' उनमें से एक नहीं है। बस यह अपने मिशन को उतने असरदार तरीके से पूरा नहीं कर पाती, जितना इसे करना चाहिए था।
'अल्फा' को 5 में से 2.5 स्टार।
(इस फिल्म का रिव्यू अनिंदिता मुखोपाध्याय ने किया है। वह इंडिया टीवी इंग्लिश के लिए लिखती हैं। यहां उनकी प्रोफाइल है।)