भारत के हर राज्य का कोना-कोना अनोखे और अद्भुत रहस्यों से भरा हुआ है। लगभग हर राज्य में ऐसी जगहें, मोहल्ले, कस्बे इत्यादि हैं जिनसे जुड़ा कोई न कोई वायरल होते ही सीक्रेट लोगों को हैरान कर देता है। आज इसी क्रम में हम आपको दिल्ली के मयूर विहार से जुड़े एक ऐसे ही सीक्रेट से रूबरू कराएंगे। मयूर विहार...एक ऐसा नाम जिसकी शुरुआत में 'मयूर' शब्द जुड़ते ही लोगों को लगता है कि शायद इस जगह का नाम मोरों से जुड़ा हो। तो आपको बता दें कि, हां..मयूर विहार का नाम मोरों के आधार पर ही पड़ा है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह 'मोरों का निवास स्थान (विहार)' रहा है।
मयूर विहार के बारे में जानें
मयूर विहार पूर्वी दिल्ली का एक पॉश रिहायशी इलाका है जो कि नोएडा-दिल्ली बॉर्डर के समीप यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित है और तीन अलग-अलग फेज (चरण) यानी I, II, III में बंटा हुआ है। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने 1970-80 के दशक में यहां पर कई आवासीय योजनाएं शुरू कीं। 1979-80 के आसपास ट्रांस यमुना क्षेत्र में सरकारी कर्मचारियों, सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों (PSU) और अर्ध सरकारी कर्मचारियों के फ्लैट एलॉट किए गए। ये विभिन्न आय वर्ग (HIG, MIG, LIG) को कलेक्टिव तौर पर बसाने का एक एक्सपेरिमेंट भी था। इसके बाद धीरे-धीरे इस क्षेत्र को विकसित किया गया।
मयूर विहार का मोर से कनेक्शन
इंस्टाग्राम पर @delhihouses नामक हैंडल से एक पोस्ट शेयर की गई। इसके कैप्शन में दावा करते हुए यूजर द्वारा लिखा गया कि, “मयूर विहार फेज-1, पॉकेट-1: अगर मुझे सही याद है, तो इस क्षेत्र में (जो कभी घना जंगल हुआ करता था और जहां बहुत सारे मोर आते थे इसीलिए इसका नाम मयूर विहार पड़ा) डीडीए के पहले कुछ फ्लैट 70 के दशक के अंत में बने थे।'
वहीं, सोशल मीडिया पर प्रचलित कई अन्य रिपोर्ट्स में भी दावा किया गया कि, 1970 के दशक तक यमुना के पार का ये इलाका अपेक्षाकृत कम आबादी वाला, खुला और जंगली हुआ करता था। बताते हैं कि, उस समय यह इलाका मोरों की मधुर ध्वनि से गूंजता रहता था क्योंकि उनकी तादात बहुतायत में थी। यही वजह है कि, जैसे-जैसे वहां लोग बसने लगे तो इस क्षेत्र को वे मोरों का स्वतंत्र और प्राकृतिक आवास मानने लगे। हालांकि, शहरीकरण होने के साथ मोरों की संख्या घटती गई और पहले जैसी नहीं रही। मगर, लॉकडाउन जैसी स्थितियों में कुछ मोरों के दिखने की इक्का-दुक्का घटनाएं भी स्पॉट हुईं, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक संबंध का स्मरण कराती हैं।

आधिकारिक डॉक्यूमेंट उपलब्ध नहीं
आपको बता दें कि, मयूर विहार के नाम जुड़ा कोई ऐसा आधिकारिक सरकारी अधिसूचना आधारित डॉक्यूमेंट उपलब्ध नहीं है जिसमें ये दावा मिलता हो कि मोरों की वजह से इस जगह का नाम रखा गया हो, इसलिए इंडिया टीवी इन दावों के प्रमाणिक होने की पुष्टि नहीं करता है। हालांकि, DDA द्वारा नियोजित विकास, क्षेत्र की पूर्व शहरी पारिस्थितिकी इस बात की तस्दीक करती है और तथ्यात्मक तौर पर इसे स्थापित करती है। गौरतलब है कि, हाल के वर्षों में MCD द्वारा मयूर विहार में मोर थीम वाले पार्क बच्चों के लिए विकसित करने की योजना पर काम शुरू हुआ है। ये योजना इस सांस्कृतिक-पारिस्थितिकी संबंध को दर्शाती है।
मयूर विहार में रहने के फायदे
गौरतलब है कि, आज मयूर विहार पूर्वी दिल्ली के अपेक्षाकृत सुव्यवस्थित और पॉश रिहायशी इलाकों में गिना जाता है। यहां पर आपको अच्छी सड़कें, पार्क, स्कूल, मार्केट और फैसिलिटी मिल जाती हैं। यमुना के पास स्थित होने के कारण प्राकृतिक चुनौतियां भी रही हैं, जिन पर DDA समय-समय पर कार्रवाई करता रहा है। परंतु नाम की जड़ें स्थानीय प्रकृति से जुड़ी हैं।
मयूर विहार में कनेक्टिविटी
आपको ये भी बता दें कि, कनेक्टिविटी के लिहाज से भी मयूर विहार काफी समृद्ध है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और मयूर विहार के बीच की दूरी 32 किमी है। इसके अलावा मयूर विहार बस स्टैंड और मयूर विहार ब्रिज बस स्टैंड मयूर विहार के कुछ बस स्टॉप हैं। वहीं, मयूर विहार और दिल्ली एयरपोर्ट के बीच यात्रा की दूरी लगभग 23 किमी है। यहां पर मयूर विहार फेज-1 और 'श्रीराम मंदिर मयूर विहार (पूर्व में मयूर विहार पैकेट-1) यानी दो मेट्रो स्टेशन भी हैं।

कैसे पहुंचे मयूर विहार
दिल्ली एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन से मयूर विहार पहुंचने का सबसे तेज और आसानी तरीका मेट्रो है। आप दिल्ली एयरपोर्ट से सुभाष नगर स्टेशन तक सीधी मेट्रो ले सकते हैं। नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से भी आपको सीधे मयूर विहार-1 और मयूर विहार एक्सटेंशन की ब्लू लाइन मेट्रो मिल जाएगी। इसके बाद टैक्सी का विकल्प है जिसका किराया 550 रुपये से 700 रुपये तक हो सकता है। इसमें आपको एक घंटा 45 मिनट का समय लग सकता है। दिल्ली एयरपोर्ट से मयूर विहार बस से भी पहुंच सकते हैं जिसमें 2 घंटे या इससे ज्यादा का समय भी लग सकता है।
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