Viral Video : दिल्ली-एनसीआर देश के सबसे महंगे शहरों में शुमार है। एक व्यक्ति का मासिक खर्च (रेंट छोड़कर) औसतन हजारों तक पहुंच जाता है। जिसकी वजह उच्च किराया, खाने-पीने व किराने का महंगा भाव, ट्रांसपोर्ट, यूटिलिटी बिल (बिजली-पानी) और शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च है। वहीं जनसंख्या दबाव, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और हाई डिमांड से लागत बढ़ रही है। मध्यम वर्ग के लिए बजट मैनेज करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसी बीच, एक IIT पीएचडी स्कॉलर का एक पोस्ट, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि एनसीआर में 1 लाख रुपये प्रति माह से कम वेतन पर दंपति कैसे गुजारा करते हैं ? उनकी इस पोस्ट पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रियाएं दी हैं।
एक्स पर शेयर की पोस्ट
इस पोस्ट को @DarrKaMahaulHai नामक हैंडल से एक्स पर शेयर किया गया है। आईआईटी के पीएचडी छात्र मिश्रा देव ने लिखा कि, 'एनसीआर में जीवनयापन का खर्च बहुत ज्यादा है। मुझे समझ नहीं आता कि एक दंपत्ति 50-60 हजार रुपये प्रति माह में कैसे गुजारा कर सकता है। 1 लाख रुपये प्रति माह से कम कमाने वाले लोग खर्च कैसे पूरा करते हैं? मैं एक तरह से सादगी पसंद इंसान हूँ और दो लोगों के लिए न्यूनतम जीवनयापन का खर्च 85-95 हजार रुपये प्रति माह है।'
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
इस पोस्ट के वायरल होने के बाद इस पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने बताया कि, 'नोएडा जाकर हमें भी ऐसा ही लगा। शायद हमें बहुत महंगे घर दिखाए गए। हमने ऐसे घर देखे जहां 2 बेडरूम वाले फ्लैट का किराया 45,000 से 50,000 रुपये प्रति माह था, साथ में मेंटेनेंस चार्ज भी देना था, और एक और घर था जहां 3 बेडरूम वाले फ्लैट का किराया 75,000 रुपये प्रति माह था, साथ में 15,000 रुपये मेंटेनेंस चार्ज भी देना था।' दिल्ली के एक अन्य यूजर ने बताया कि 'मैं दिल्ली में रहता हूं, मेरा मासिक खर्च लगभग 70,000 रुपये है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं अपने पिता द्वारा खरीदे गए फ्लैट में रहता हूं, मेरी जरूरतें कम हैं। 70,000 रुपये में मेरा, मेरी पत्नी और मेरे 11 साल के बच्चे का खर्च शामिल है। यह खर्च निश्चित रूप से बढ़ेगा।' कुछ यूजर्स का यह भी कहना है कि 50,000 से 60,000 रुपये प्रति माह कमाने वाले कई लोग जरूरी नहीं कि आराम से जीवन जी रहे हों, बल्कि वे केवल गुजारा करने के लिए समझौता कर रहे हैं। एक यूजर्स ने लिखा , 'एनसीआर में 50-60 हजार रुपये में लोग आराम से नहीं जी रहे हैं। वे बस समझौता कर रहे हैं। दूर सस्ते किराए। लंबा सफर। क्रेडिट कार्ड का बिल चुकाना। कोई बचत नहीं। परिवार का सहारा। स्वास्थ्य सेवाओं में देरी। गलतियों की कोई गुंजाइश नहीं। यह किफायती होना नहीं है। यह बेहतर तरीके से गुजारा करना है।'
यूजर्स ने लाइफस्टाइल को बताया जिम्मेदार
कई यूजर्स का ऐसा मानना भर था कि, खर्च करने की आदतें और जीवनशैली भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। एक अन्य यूजर ने लिखा, 'गुरुग्राम में लोग 30,000 रुपये प्रति माह में गुजारा कर रहे हैं। और कुछ लोगों के लिए तो 3 लाख रुपये भी काफी नहीं होंगे। बात शहर की नहीं, बल्कि अपने खर्चों की है जिन्हें आपको संभालना होगा।' कई यूजर्स ने यह भी बताया कि शहरों में जीवनयापन की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन वेतन वृद्धि उस अनुपात में नहीं हो रही है। एक टिप्पणी में लिखा था, 'जीवनयापन की लागत हर जगह बढ़ रही है, लेकिन वेतन नहीं बढ़ रहे हैं।'
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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