पुरानी दिल्ली का हर एक अलग मोहल्ला अपनी ऐतिहासिक विरासत को आज भी संजोए हुए है। पुरानी दिल्ली की बात करते ही बल्लीमारान, चांदनी चौक, पहाड़गंज और जामा मस्जिद समेत कई इलाकों के नाम ज़हन में आ जाते हैं। इन्हीं में से दिल्ली का एक मशहूर इलाका दरियागंज भी है जो आमतौर पर संडे बुक मार्केट के लिए काफी फेमस है। साथ ही दरियागंज दिल्ली दर्शन पर निकलने वाले लगभग हर टूरिस्ट का पसंदीदा मार्केट भी है। हालांकि, दरियागंज का पहली बार नाम सुनकर किसी को भी लग सकता है कि शायद यहां कोई दरिया या तालाब होगा मगर ऐसा नहीं है बल्कि, दरियागंज के नाम अभिप्राय इससे काफी अलग है। आज हम आपको बताएंगे कि, दरियागंज में दरिया-समंदर-तालाब न होने के बावजूद इसे दरियागंज क्यों कहते हैं?
दरियागंज नाम का मतलब समझ लें
सबसे पहले तो आपको बता दें कि, दरियागंज दो शब्दों के मिश्रण से बना है- दरिया+गंज...दरिया का अर्थ 'नदी' और गंज का अर्थ 'बाजार' से है। इसका अभिप्राय है- 'नदी के किनारे का बाजार।' किंवदंतियों के मुताबिक, यहां पर दरिया यमुना नदी के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है जो किसी समय दीवारों वाले शहर शाहजहानाबाद के ठीक बाहर पूर्वी दीवारों के साथ प्रवाहित होती थी।
दरियागंज का मुगल कनेक्शन
ऐतिहासिक स्रोतों के मुताबिक, मुगल काल के दौरान यानी 17वीं शताब्दी में शाहजहां ने 1649 से 1648 के बीच शाहजहानाबाद की नींव रखी थी जिसे आज पुरानी दिल्ली के नाम से जाना जाता है। उस समय यमुना नदी इसी इलाके से समीप प्रवाहित होती थी और ये नदी व्यापार, परिवहन व पानी की मुख्य सोर्स थी। दरियागंज को हमेशा से नदी के तट पर हलचल भरा व्यापारिक केंद्र माना जाता रहा है।
क्यों नाम पड़ा दरियागंज
स्थानीय लोगों की मानें तो यमुना नदी के किनारे स्थित होने के कारण इस इलाके का नाम दरियागंज पड़ गया। हालांकि, कुछ इतिहासकार और इसकी अलग-अलग व्याख्या देते हैं। माना जाता है, मुगल काल में यह क्षेत्र काफी समृद्ध हुआ करता था। क्योंकि यहां पर दोनों तरफ दुकानें और बीच में पानी की धारा के साथ पेड़-पौधे हुआ करते थे।
दरियागंज में क्या-क्या था
बताते हैं कि, दरियागंज ऐतिहासिक रूप से काफी महत्व रखता है। दरअसल, मुगल काल में यहां रईसों की हवेलियां हुआ करती थीं। इसके बाद ब्रिटिश काल में यहां कैंट क्षेत्र भर रहा। हालांकि, मुगलकालीन दीवारों के अवशेष, पुरानी हवेलियां और संकरी गलियां आज भी दरियागंज के ऐतिहासिक जुड़ाव का स्मरण कराता है।
आजादी के बाद कैसा था दरियागंज
देश में आजादी के बाद दरियागंज को एक नई पहचान मिली। यहां पर रेस्तरां की स्थापना हुई जहां से कई व्यंजनों को एक अलग और खास पहचान मिली। इसके बाद धीरे-धीरे दरियागंज औद्योगिक लिहाज से काफी समृद्ध होता चला गया। यहां पर कई प्रकाशकों और प्रेस को भी जगह मिली और 1960 के दशक से यहां रविवार की बुक मार्केट की शुरुआत हुई। रविवार की बुक मार्केट पहले तो फुटपाथ पर लगती थी और बाद में महिला हाट के रूप में विकसित हुई। यहां पर सस्ती, पुरानी और दुर्लभ किताबें भी देखने को मिलती हैं।
अंततोगत्वा दरियागंज के लिए कहा जाए तो...समय बदला, नदी दूर गई मगर दरियागंज का नाम और इतिहास आज भी वहां की किताबों की खुशबू, वास्तुकला और व्यापारिक हलचल में जीवंत है।
गौरतलब है कि, इससे पहले हमने आपको पहाड़गंज के बारे में बताया था कि, जब यहां कोई पहाड़ नहीं तो क्यों कहलाता है पहाड़गंज? इस स्टोरी में पहाड़गंज का पूरा इतिहास बताया गया था।
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